
श्रावस्ती (उत्तर प्रदेश):आज के आधुनिक और वैज्ञानिक युग में भी समाज में अंधविश्वास की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका एक ताजा और हैरान कर देने वाला उदाहरण उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले से सामने आया है। यहां एक मूक पशु की गंभीर बीमारी को स्थानीय ग्रामीणों ने ‘ईश्वरीय चमत्कार’ मान लिया और उसकी जान बचाने के उपाय करने के बजाय वहां पूजा-पाठ और मेले जैसा माहौल तैयार कर दिया। मामला श्रावस्ती जिले के इकौना थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बसभरिया पुरैना गांव का है, जहां एक गाय पिछले सात दिनों से बिना रुके एक ही खेत के चारों तरफ गोल-गोल चक्कर काट रही थी। आठवें दिन जब वह गाय बेसुध होकर गिरी और पशु डॉक्टरों की टीम मौके पर पहुंची, तब जाकर इस कथित चमत्कार के पीछे छिपा एक बेहद दर्दनाक वैज्ञानिक सच सामने आया।
कैसे शुरू हुआ ‘चमत्कार’ का यह सिलसिला?
घटना की शुरुआत करीब एक सप्ताह पहले हुई थी। बसभरिया पुरैना गांव के सीवान (खेतों) में एक लावारिस गाय अचानक एक विशेष खेत के चारों तरफ गोल-गोल घूमने लगी। शुरुआत में वहां से गुजरने वाले किसानों ने इसे एक सामान्य प्रक्रिया समझा, लेकिन जब उस गाय ने दिन से रात और रात से सुबह तक बिना रुके एक ही दिशा में चक्कर काटना जारी रखा, तो ग्रामीणों के कान खड़े हो गए।
गाय बिना कुछ खाए-पिए, लगातार 24 घंटे और फिर अगले सात दिनों तक एक ही लय में, एक ही दायरे के भीतर गोल-गोल घूमकर खेत की परिक्रमा करती रही। ग्रामीण इलाकों में इस तरह की अजीबोगरीब घटना को तुरंत धर्म और आस्था से जोड़ दिया गया। देखते ही देखते पूरे गांव और फिर आसपास के दर्जनों गांवों में यह बात हवा की तरह फैल गई कि पुरैना गांव के खेत में साक्षात ‘गोमाता’ किसी दैवीय शक्ति के प्रभाव में आकर परिक्रमा कर रही हैं।
पूजा-पाठ, मन्नतें और जुटने लगी भारी भीड़
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, खेत का वह हिस्सा एक धार्मिक स्थल के रूप में तब्दील होने लगा। अंधविश्वास का आलम यह था कि लोगों ने गाय के परिक्रमा मार्ग से थोड़ी दूरी पर धूप-बत्ती और अगरबत्ती जलानी शुरू कर दी। महिलाओं ने मंगल गीत और भजन गाने शुरू कर दिए। कई लोग गाय को साष्टांग प्रणाम करने लगे और वहां आकर अपनी मन्नतें मांगने लगे।
वहां मौजूद भीड़ गाय को पुण्य कमाने के चक्कर में जबरन चारा, केला और पानी देने का प्रयास कर रही थी, लेकिन अपने ही धुन में गोल-गोल घूम रही गाय किसी की तरफ देख भी नहीं रही थी। वह लगातार बस चक्कर काटे जा रही थी। लोगों को लगा कि गाय इस समय पूरी तरह से ‘भक्ति’ में लीन है और वह किसी सांसारिक वस्तु को स्वीकार नहीं करेगी।
8वें दिन थमीं सांसें और खुला रहस्य
लगातार सात दिनों तक (लगभग 168 घंटे) बिना रुके और बिना कुछ खाए-पिए गोल-गोल घूमने के कारण गाय का शरीर पूरी तरह से टूट चुका था। आठवें दिन यानी शनिवार को अचानक गाय के पैर लड़खड़ाए, उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया और वह बेसुध होकर एक जगह जमीन पर गिर गई।
गाय को इस तरह मरणासन्न स्थिति में गिरता देख ग्रामीणों में हड़कंप मच गया। इसकी सूचना तुरंत जिला प्रशासन और पशुपालन विभाग को दी गई। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी (CVO) डॉ. मानवेंद्र सिंह ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तुरंत पशु डॉक्टरों की एक विशेष टीम को बसभरिया पुरैना गांव के लिए रवाना किया।
जब डॉक्टरों की टीम ने मौके पर पहुंचकर जमीन पर तड़प रही गाय का गहन चिकित्सीय परीक्षण किया, तो उन्होंने ग्रामीणों के ‘चमत्कार’ वाले दावों को सिरे से खारिज कर दिया। डॉक्टरों ने जो खुलासा किया, उसने वहां मौजूद हर अंधविश्वासी व्यक्ति को झकझोर कर रख दिया।
क्या है ‘सर्कलिंग डिजीज’ का वैज्ञानिक सच?
पशु चिकित्सकों ने बताया कि गाय किसी चमत्कार या दैवीय शक्ति के कारण खेत की परिक्रमा नहीं कर रही थी, बल्कि वह एक अत्यंत जानलेवा और गंभीर न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका तंत्र) बीमारी से पीड़ित है। चिकित्सीय विज्ञान की भाषा में इस बीमारी को ‘सर्कलिंग डिजीज’ (Circling Disease) कहा जाता है, जिसका तकनीकी नाम ‘लिस्टेरियोसिस’ (Listeriosis) है।
डॉक्टरों ने इस बीमारी के लक्षणों और कारणों को विस्तार से समझाते हुए बताया:
- मस्तिष्क का संक्रमण: यह बीमारी ‘लिस्टेरिया मोनोसाइटोजेन्स’ (Listeria monocytogenes) नामक एक बेहद खतरनाक बैक्टीरिया के कारण होती है। यह बैक्टीरिया मुख्य रूप से दूषित, सड़े-गले चारे, साइलेज या दूषित पानी के जरिए पशु के शरीर में प्रवेश करता है।
- संतुलन खोना: शरीर में पहुंचने के बाद यह बैक्टीरिया सीधे पशु के मस्तिष्क (Brain) और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है। इसके कारण मस्तिष्क के एक हिस्से में सूजन आ जाती है और पशु के दिमाग का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है।
- एक ही दिशा में घूमना: दिमाग का संतुलन बिगड़ने के कारण पशु को केवल एक ही तरफ दिखाई देना बंद हो जाता है या उसके शरीर का एक हिस्सा पूरी तरह से सुन्न या खिंचाव में आ जाता है। इस कारण पशु चाहकर भी सीधा नहीं चल पाता और वह मजबूरन एक ही दिशा में गोल-गोल घूमने लगता है। पशु को खुद भी यह एहसास नहीं होता कि वह एक ही जगह पर बार-बार चक्कर काट रहा है।
- अंतिम चरण की विभीषिका: इस बीमारी के अंतिम चरण में पशु लगातार घूमने के कारण अत्यधिक थक जाता है, उसे बहुत तेज बुखार आता है, वह अंधा हो जाता है और अंत में पैरालिसिस (लकवा) का शिकार होकर जमीन पर गिर जाता है। अगर समय पर इलाज न मिले, तो पशु की तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है।
डॉक्टरों ने शुरू किया इलाज, लोगों से की अपील
पशु डॉक्टरों की टीम ने तुरंत उस बीमार गाय को जीवनरक्षक दवाएं, भारी मात्रा में एंटीबायोटिक्स और ग्लूकोज (ड्रिप) चढ़ाना शुरू कर दिया है। डॉक्टरों के मुताबिक, गाय की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है क्योंकि सात दिनों तक लगातार शारीरिक श्रम करने और भूखे-प्यासे रहने के कारण उसके शरीर के अंगों ने काम करना लगभग बंद कर दिया है। डॉक्टर उसे बचाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं।
इस घटना के सामने आने के बाद पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने ग्रामीण इलाकों के लोगों से एक विशेष अपील जारी की है। डॉक्टरों ने कहा है कि जब भी कोई मूक पशु किसी असामान्य व्यवहार को प्रदर्शित करे—जैसे लगातार सिर पटकना, एक ही दिशा में गोल-गोल घूमना, या शरीर का कांपना—तो उसे किसी चमत्कार या भूत-प्रेत का साया मानकर समय बर्बाद न करें। यह सभी लक्षण गंभीर बीमारियों के होते हैं। यदि गांव वाले पहले या दूसरे दिन ही अंधविश्वास में पड़ने के बजाय डॉक्टरों को बुला लेते, तो शायद आज गाय की हालत इतनी गंभीर नहीं होती। यह घटना समाज के लिए एक बड़ा सबक है कि आस्था अपनी जगह है, लेकिन वैज्ञानिक चेतना और जीव दया सबसे ऊपर होनी चाहिए।