‘जूनियर के अधीन काम नहीं करूंगा…’, कानपुर साइबर क्राइम थाने के इंस्पेक्टर के इस्तीफे से पुलिस महकमे में छिड़ा ‘वरिष्ठता विवाद’

UTTAR PRADESH
पुलिस इंस्पेटर के रिजाइन पर छिड़ी बहस (Photo: representational image)

कानपुर: उत्तर प्रदेश पुलिस के भीतर आत्मसम्मान, वरिष्ठता (Seniority) और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर एक अभूतपूर्व विवाद खड़ा हो गया है। कानपुर पुलिस कमिश्नरेट के साइबर क्राइम थाने में तैनात एक वरिष्ठ इंस्पेक्टर ने अपने पद से इस्तीफा देकर पूरे पुलिस महकमे और प्रशासनिक गलियारों में खलबली मचा दी है। इंस्पेक्टर का स्पष्ट रूप से कहना है कि वह अपने से जूनियर अधिकारी के मातहत (अंडर) काम करने में पूरी तरह असमर्थ हैं और खाकी की गरिमा तथा अपने आत्मसम्मान के खातिर नौकरी छोड़ने को तैयार हैं।

इस इस्तीफे ने न केवल कानपुर कमिश्नरेट की आंतरिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि सोशल मीडिया से लेकर पुलिस बैरकों तक एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, कानपुर पुलिस कमिश्नरेट के साइबर क्राइम थाने में तैनात इंस्पेक्टर अपने सेवाकाल और अनुभव के लिहाज से विभाग में काफी वरिष्ठ माने जाते हैं। विवाद की शुरुआत तब हुई जब हाल ही में विभाग द्वारा कुछ आंतरिक फेरबदल और तैनातियां की गईं। इस नई व्यवस्था के तहत साइबर क्राइम थाने की कमान एक ऐसे अधिकारी को सौंप दी गई, जो सेवाकाल, रैंक या बैच के लिहाज से उक्त इंस्पेक्टर से काफी जूनियर हैं।

अपने से कम अनुभवी और जूनियर अधिकारी के अधीन काम करने के आदेश को इंस्पेक्टर स्वीकार नहीं कर पाए। उन्होंने इसे अपने लंबे सेवाकाल और व्यक्तिगत आत्मसम्मान के खिलाफ समझा। इसके बाद, उन्होंने बिना किसी देरी के पुलिस कमिश्नर को अपना लिखित इस्तीफा सौंप दिया। इस्तीफे में उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा कि वह किसी भी परिस्थिति में अपने जूनियर के अधीन काम नहीं करेंगे और इस प्रकार के मानसिक दबाव में रहने से बेहतर है कि वह सेवा से मुक्त हो जाएं।

खाकी के भीतर ‘अनुशासन’ बनाम ‘आत्मसम्मान’ की बहस

इस हाई-प्रोफाइल इस्तीफे ने उत्तर प्रदेश पुलिस के भीतर एक ऐसे संवेदनशील मुद्दे को हवा दे दी है, जिस पर आमतौर पर लोग खुलकर बात करने से बचते हैं। पुलिस महकमे में इस समय दो अलग-अलग पक्ष आमने-सामने नजर आ रहे हैं:

1. अनुशासन और आदेश सर्वोपरि (प्रशासन का पक्ष)

पुलिस के उच्च अधिकारियों और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि पुलिस विभाग पूरी तरह से कड़े अनुशासन और कमांड स्ट्रक्चर (कमांड व्यवस्था) पर चलता है। यहाँ व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि ‘पद’ और ‘आदेश’ महत्वपूर्ण होते हैं। सरकार या कमिश्नरेट को यह पूरा अधिकार है कि वह किस अधिकारी को उसकी योग्यता के अनुसार कहाँ और क्या जिम्मेदारी सौंपता है। यदि हर अधिकारी अपनी सीनियरिटी का हवाला देकर मनपसंद पोस्टिंग या बॉस की मांग करने लगेगा, तो पुलिस की आंतरिक व्यवस्था को संभालना और कानून-व्यवस्था को सुचारू रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इस नजरिए से इंस्पेक्टर के कदम को अनुशासनहीनता के दायरे में देखा जा रहा है।

2. आत्मसम्मान और वरिष्ठता की अनदेखी (समर्थकों का पक्ष)

दूसरी तरफ, पुलिसकर्मियों का एक बहुत बड़ा वर्ग सोशल मीडिया और निजी चर्चाओं में इस्तीफा देने वाले इंस्पेक्टर के समर्थन में उतर आया है। उनका तर्क है कि 20-25 साल की ईमानदारी से की गई नौकरी के बाद अगर किसी अधिकारी को अपने से जूनियर के सामने रिपोर्ट करना पड़े या उसके आदेश मानने पड़ें, तो यह मानसिक रूप से प्रताड़ित करने जैसा है। समर्थकों का कहना है कि कमिश्नरेट प्रणाली में तैनातियों के दौरान अधिकारियों के अनुभव, सेवाकाल और बैच का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि फील्ड में काम कर रहे स्टाफ का मनोबल न टूटे।

कमिश्नरेट प्रणाली और पोस्टिंग नीतियों पर सवाल

कानपुर जैसे बड़े महानगरों में कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कमिश्नरेट प्रणाली लागू की गई थी, ताकि त्वरित निर्णय लिए जा सकें और पुलिसिंग को अधिक पेशेवर बनाया जा सके। हालांकि, इस इस्तीफे ने यह उजागर कर दिया है कि आंतरिक स्तर पर मानव संसाधन (HR) का प्रबंधन और तैनातियों की नीतियां कभी-कभी गंभीर अंतर्विरोधों को जन्म देती हैं।

साइबर क्राइम जैसे तकनीकी विंग में अक्सर आधुनिक योग्यता और विशेषज्ञता को प्राथमिकता दी जाती है, जिसके कारण कभी-कभी जूनियर अधिकारियों को बड़ी कमान सौंप दी जाती है। लेकिन जब यह व्यवस्था पारंपरिक पुलिसिंग के स्थापित नियमों और वरिष्ठता के सिद्धांतों से टकराती है, तो इस तरह के विस्फोटक हालात पैदा होते हैं।

कानपुर पुलिस कमिश्नरेट के आला अधिकारियों के लिए यह इस्तीफा एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन गया है। यदि इंस्पेक्टर का इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाता है, तो इससे निचले स्टाफ में असंतोष बढ़ सकता है और यह संदेश जाएगा कि विभाग वरिष्ठ अधिकारियों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं है। वहीं, अगर विभाग बैकफुट पर आकर उनकी बात मान लेता है, तो इससे अनुशासन पर सवाल उठेंगे और भविष्य में अन्य कर्मचारी भी इस तरह का दबाव बना सकते हैं।

फिलहाल, पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मामले को शांत करने और बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। इंस्पेक्टर को समझाने-बुझाने और उनकी काउंसिलिंग करने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि वे अपना इस्तीफा वापस ले लें और उन्हें किसी अन्य सम्मानजनक पद पर समायोजित किया जा सके। लेकिन इस एक इस्तीफे ने उत्तर प्रदेश पुलिस के भीतर छिपे असंतोष को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।

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