US Student Visa Rule Change: अमेरिकी छात्र वीजा नियमों में बड़ा बदलाव, क्या भारत के लिए पैदा होगी मुश्किल?

(Image for Representation: Unspalsh)

वाशिंगटन : अमेरिका में पढ़ाई करने का सपना देखने वाले और वहां पहले से उच्च शिक्षा ले रहे भारतीय छात्रों के लिए एक बहुत बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। व्हाइट हाउस ने डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) के उस विवादित प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी है, जो दशकों पुराने अमेरिकी छात्र वीजा सिस्टम की पूरी रूपरेखा को बदल कर रख देगा। इस नए नियम के तहत अंतरराष्ट्रीय छात्रों को मिलने वाली ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ (Duration of Status) की व्यवस्था को खत्म कर उसकी जगह ‘फिक्स्ड पीरियड ऑफ स्टे’ (Fixed Period of Stay) यानी रहने की एक निश्चित समय-सीमा तय कर दी जाएगी। अमेरिकी समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग के मुताबिक, नए नियमों के लागू होने के बाद छात्रों के वीजा की वैधता अधिकतम 4 साल के लिए सीमित की जा सकती है।

चूंकि वर्तमान में भारत, अमेरिका में विदेशी छात्रों का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है, इसलिए इस फैसले का सबसे व्यापक और गहरा असर भारतीय छात्र-छात्राओं पर पड़ने की आशंका है। विशेषकर उन छात्रों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं जो पीएचडी (Doctoral), गहन शोध आधारित मास्टर डिग्री (Research-intensive Master’s) या अन्य लंबे समय तक चलने वाले कोर्सेज में दाखिला लिए हुए हैं।

क्या है ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ और नए नियम से क्या बदलेगा?

वर्तमान में लागू ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ (D-S) व्यवस्था के तहत, यदि कोई अंतरराष्ट्रीय छात्र (मुख्य रूप से F-1 और J-1 वीजा धारक) अमेरिका के किसी मान्यता प्राप्त संस्थान में पढ़ाई कर रहा है और वहां के सभी नियमों का पालन कर रहा है, तो वह तब तक कानूनी रूप से अमेरिका में रह सकता है जब तक उसकी पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती। इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसकी लचीलापन (Flexibility) थी:

  • कोर्स एक्सटेंशन और ट्रांसफर: छात्रों को ग्रेजुएशन से पोस्ट-ग्रेज्युएशन में जाने, एक यूनिवर्सिटी से दूसरी यूनिवर्सिटी में ट्रांसफर लेने या अपने रिसर्च की अवधि बढ़ाने के लिए बार-बार अमेरिकी सरकार या आव्रजन (Immigration) विभाग से नए सिरे से अनुमति नहीं लेनी पड़ती थी।
  • OPT और STEM OPT: पढ़ाई पूरी होने के बाद मिलने वाले ‘ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ (OPT) के तहत काम करने के लिए भी छात्रों को वीजा स्टेटस को लेकर बहुत ज्यादा प्रशासनिक भागदौड़ नहीं करनी पड़ती थी।

नए ‘फिक्स्ड पीरियड ऑफ स्टे’ का प्रभाव

व्हाइट हाउस के ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट (OMB) द्वारा समीक्षा पूरी होने के बाद, अब नया नियम लागू होने के बेहद करीब है। इसके तहत:

  1. 4 साल की तय सीमा: अधिकांश अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अमेरिका में प्रवेश के समय केवल 4 वर्ष की निश्चित अवधि के लिए ही वैध प्रवास (Stay) की अनुमति मिलेगी।
  2. USCIS से मंजूरी की अनिवार्यता: यदि किसी छात्र का कोर्स 4 साल में पूरा नहीं होता है (जैसे पीएचडी कोर्सेज जिन्हें पूरा होने में अक्सर 5 से 7 साल का समय लगता है), तो उसे अमेरिका में अपना प्रवास जारी रखने के लिए ‘यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज’ (USCIS) के पास औपचारिक रूप से आवेदन करना होगा।
  3. कड़ी स्क्रूटनी और बायोमेट्रिक्स: इस एक्सटेंशन प्रक्रिया के दौरान छात्रों को अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने होंगे, नए सिरे से बायोमेट्रिक्स प्रक्रियाओं से गुजरना होगा और अमेरिकी अधिकारियों की कड़ी आव्रजन स्क्रूटनी (Immigration Scrutiny) का सामना करना पड़ेगा।

भारतीय छात्रों के लिए क्यों खड़ी हो सकती है बड़ी मुसीबत?

यह बदलाव भारत के लिए इसलिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि अमेरिकी उच्च शिक्षा में इस वक्त भारतीय छात्रों का दबदबा सबसे ज्यादा है। ‘ओपन डोर्स 2024’ (Open Doors 2024) की रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2023-24 में 3,31,000 से अधिक भारतीय छात्र अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में नामांकित थे। यह संख्या अमेरिका में मौजूद कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों का लगभग 30% है।

अंतरराष्ट्रीय छात्र प्रतिशत (अमेरिका में)
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■ भारतीय छात्र: ~30% (3,31,000+ छात्र)
■ अन्य वैश्विक छात्र: ~70%
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भारतीय छात्रों पर पड़ने वाले मुख्य प्रभाव:

  • रिसर्च और पीएचडी कोर्सेज में अनिश्चितता: भारतीय छात्रों का एक बहुत बड़ा हिस्सा साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स (STEM) के क्षेत्र में रिसर्च और डॉक्टरेट की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाता है। रिसर्च प्रोजेक्ट्स के टाइमलाइन अक्सर अनिश्चित होते हैं और इनमें 4 साल से अधिक का समय लगना आम बात है। नए नियम से इन छात्रों के मन में अपने भविष्य को लेकर ‘असुरक्षा और अनिश्चितता’ की भावना पैदा होगी।
  • कागजी कार्रवाई और प्रशासनिक देरी: अमेरिका के आव्रजन विभागों में पहले से ही बैकलॉग (लंबित आवेदनों की संख्या) बहुत ज्यादा रहता है। ऐसे में लाखों छात्रों द्वारा एक साथ एक्सटेंशन के लिए आवेदन करने से प्रोसेसिंग में भारी देरी हो सकती है, जिससे छात्रों की पढ़ाई और उनके शैक्षणिक सत्र प्रभावित होंगे।
  • रोजगार (OPT) के अवसरों पर असर: पढ़ाई खत्म करने के बाद मिलने वाले व्यावहारिक कार्य अनुभव (OPT) में ट्रांजिशन करने के दौरान यदि वीजा एक्सटेंशन की मंजूरी में देरी होती है, तो कंपनियों के लिए भारतीय प्रोफेशनल्स को नौकरी पर रखना या उनके वर्क परमिट को प्रोसेस करना बेहद पेचीदा हो जाएगा।

‘अनलॉफुल प्रेजेंस’ (अवैध प्रवास) का बढ़ा खतरा

इस नए ड्राफ्ट में सबसे डराने वाला प्रावधान ‘अनलॉफुल प्रेजेंस’ (Unlawful Presence) की गणना को लेकर है। आव्रजन मामलों की दिग्गज कानूनी फर्म ‘फ्रेगोमेन’ (Fragomen) के विश्लेषण के अनुसार:

“यदि कोई छात्र अपनी निर्धारित 4 साल की अवधि समाप्त होने से पहले एक्सटेंशन हासिल करने में असफल रहता है, या किसी प्रशासनिक गलती/देरी के कारण उसका आवेदन समय पर मंजूर नहीं होता, तो वीजा अवधि समाप्त होते ही उसके खाते में ‘अवैध प्रवास’ के दिन जुड़ने शुरू हो जाएंगे।”

अमेरिका के सख्त आव्रजन कानूनों के मुताबिक, यदि किसी विदेशी नागरिक के नाम पर एक निश्चित अवधि से ज्यादा का ‘अवैध प्रवास’ दर्ज हो जाता है, तो उस पर भविष्य में अमेरिका आने, नया वीजा प्राप्त करने या देश में प्रवेश करने पर 3 से 10 साल तक का कड़ा प्रतिबंध (Travel Ban) लगाया जा सकता है। यह नियम भारतीय छात्रों को किसी भी छोटी सी तकनीकी या प्रशासनिक गलती के कारण सीधे डिपोर्टेशन (देश निकाला) या ब्लैकलिस्ट होने के मुहाने पर लाकर खड़ा कर देगा।

अमेरिकी शिक्षा जगत और यूनिवर्सिटीज में भारी विरोध

डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था, लेकिन भारी विरोध के कारण तब इसे लागू नहीं किया जा सका था। साल 2025 में इस विचार को दोबारा पुनर्जीवित किया गया और अब 2026 में इसे अंतिम मंजूरी मिल चुकी है।

इस नियम का सिर्फ विदेशी छात्र ही नहीं, बल्कि खुद अमेरिका के बड़े शिक्षा संगठन और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भी पुरजोर विरोध कर रहे हैं। ‘एसोसिएशन ऑफ अमेरिकन यूनिवर्सिटीज’ (AAU), ‘अमेरिकन काउंसिल ऑन एजुकेशन’ (ACE) और ‘नाफ्सा’ (NAFSA – एसोसिएशन ऑफ इंटरनेशनल एजुकेटर्स) जैसे शीर्ष निकायों ने अपने आधिकारिक बयानों में सरकार के इस कदम की आलोचना की है।

अमेरिकी संगठनों के मुख्य तर्क:

  • वैश्विक प्रतिभाओं का पलायन: यदि अमेरिका अपने नियमों को इतना जटिल और अनिश्चित बना देगा, तो दुनिया भर के मेधावी छात्र अमेरिका के बजाय कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया या यूरोप के अन्य देशों का रुख करेंगे, जिससे अमेरिका दुनिया में रिसर्च और इनोवेशन का हब नहीं रह जाएगा।
  • यूनिवर्सिटीज पर बढ़ा बोझ: हर साल हजारों छात्रों के वीजा एक्सटेंशन को वेरिफाई करना और उनके कानूनी स्टेटस की निगरानी करने से अमेरिकी विश्वविद्यालयों के इंटरनेशनल स्टूडेंट ऑफिस पर प्रशासनिक और वित्तीय बोझ अत्यधिक बढ़ जाएगा।

वर्तमान स्थिति और छात्रों के लिए आगे की राह

राहत की बात केवल इतनी है कि जब तक इस नए नियम का अंतिम गजट नोटिफिकेशन (Final Regulation) आधिकारिक तौर पर प्रकाशित और प्रभावी नहीं हो जाता, तब तक वर्तमान ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ की व्यवस्था पहले की तरह काम करती रहेगी। यानी जो छात्र अभी अमेरिका में हैं, उन्हें तुरंत घबराने की जरूरत नहीं है।

हालांकि, इस नीतिगत बदलाव को पिछले कई दशकों में अमेरिकी छात्र वीजा प्रणाली में किया जाने वाला सबसे बड़ा और सख्त फेरबदल माना जा रहा है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत सरकार को इस विषय पर अमेरिकी प्रशासन के साथ उच्च स्तरीय बातचीत करनी चाहिए ताकि वहां पढ़ रहे साढ़े तीन लाख से अधिक भारतीय बच्चों के भविष्य और करियर को किसी भी तरह के अप्रत्याशित संकट से बचाया जा सके। आने वाले महीनों में जब यह कानून पूरी तरह जमीन पर उतरेगा, तब भारतीय छात्रों को अपने कोर्स की अवधि और यूनिवर्सिटी के कागजी दस्तावेजों को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सतर्क रहना होगा।

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