सिंधु से इश्क, हड़प्पा का हवाला? पानी की लड़ाई में PAK को याद आई प्राचीन सभ्यता

(File PHOTO: ITG)

नई दिल्ली : पाकिस्तान और भारत के बीच पानी का विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन इस बार इस्लामाबाद ने इस जंग में एक बेहद ही अनोखा और कूटनीतिक पैंतरा चला है। पानी की कमी से जूझ रहे पाकिस्तान को अब सिंधु नदी पर अपना हक जताने के लिए 5000 साल पुरानी ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ (Indus Valley Civilization) यानी हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की याद आई है। पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस प्राचीन सभ्यता का हवाला देकर सिंधु नदी के पानी पर अपनी नई दावेदारी पेश कर रहा है।

दरअसल, यह पूरा मामला केवल इतिहास प्रेम का नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपी है पानी की वह भीषण जंग, जिसे लेकर पाकिस्तान हमेशा से डरा हुआ है। पाकिस्तान का तर्क है कि चूंकि सिंधु घाटी सभ्यता के मुख्य केंद्र—हड़प्पा और मोहनजोदड़ो—भौगोलिक रूप से आज के पाकिस्तान में स्थित हैं, इसलिए सिंधु नदी और उसके पानी पर पहला और प्राकृतिक अधिकार उसी का बनता है।

क्या है पाकिस्तान का नया ‘सभ्यता कार्ड’?

इंटरनेशनल फोरम और कूटनीतिक गलियारों में पाकिस्तान इस बात को पुरजोर तरीके से उठा रहा है कि ‘इंडस’ (Indus) शब्द से ही उसकी पहचान जुड़ी है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, वे एक नया नैरेटिव (विमर्श) गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके तहत:

  • ऐतिहासिक विरासत: पाकिस्तान का कहना है कि सिंधु नदी सिर्फ एक जलमार्ग नहीं है, बल्कि यह उनकी पांच हजार साल पुरानी सांस्कृतिक पहचान की लाइफलाइन है।
  • भूगोलीय दावा: हड़प्पा (पंजाब, पाकिस्तान) और मोहनजोदड़ो (सिंध, पाकिस्तान) इस सभ्यता के सबसे बड़े और विकसित शहर थे। पाकिस्तान इसी भूगोल को आधार बनाकर खुद को सिंधु नदी का ‘असली वारिस’ घोषित करना चाहता है।
  • अस्तित्व की लड़ाई: पाकिस्तान के कूटनीतिज्ञों का तर्क है कि भारत की तरफ से नदियों पर बनाए जा रहे बांधों के कारण उनकी इस ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत को खतरा पैदा हो गया है।

पानी की किल्लत और सिंधु जल समझौते (IWT) का डर

इस पूरे विवाद की असली जड़ इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान की कड़वी हकीकत है। पाकिस्तान इस समय इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट (Water Crisis) से गुजर रहा है। उसकी कृषि व्यवस्था पूरी तरह से सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों पर निर्भर है। दूसरी तरफ, भारत जम्मू-कश्मीर में सिंधु, झेलम और चेनाब नदियों पर कई हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स (पनबिजली परियोजनाओं) पर काम कर रहा है।

1960 में हुए सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty – IWT) के तहत इन तीन पश्चिमी नदियों का अधिकांश पानी पाकिस्तान को मिलता है, लेकिन भारत को इन पर ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ प्रोजेक्ट्स बनाने का अधिकार है। हाल के वर्षों में भारत ने इस समझौते की समीक्षा (Review) करने और इसमें संशोधन करने के लिए पाकिस्तान को कड़े नोटिस भेजे हैं। भारत का रुख साफ है कि बदले हुए भू-राजनीतिक हालातों और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए 66 साल पुराने नियमों में बदलाव जरूरी है। बस इसी बात से पाकिस्तान घबराया हुआ है। उसे डर है कि अगर भारत ने समझौते के नियमों को कड़ा किया, तो पाकिस्तान की बंजर जमीनों को पानी मिलना बंद हो जाएगा।

भारत का करारा जवाब: ‘इतिहास चुराने से सच नहीं बदलता’

पाकिस्तान के इस ‘हड़प्पा कार्ड’ पर भारतीय इतिहासकारों और विदेश नीति के विशेषज्ञों ने कड़ा ऐतराज जताया है। भारतीय पक्ष का कहना है कि सिंधु घाटी सभ्यता का दायरा सिर्फ मौजूदा पाकिस्तान तक सीमित नहीं था।

भारतीय विशेषज्ञों का तर्क: “सिंधु घाटी सभ्यता की जड़ें भारत के हरियाणा (राखीगढ़ी), गुजरात (लोथल और धोलावीरा), राजस्थान (कालीबंगा) और पंजाब में भी उतनी ही गहराई से फैली हुई हैं। राखीगढ़ी में मिले अवशेष तो हड़प्पा से भी पुराने हैं। ऐसे में किसी प्राचीन सभ्यता पर राजनीतिक या भौगोलिक एकाधिकार का दावा करना पूरी तरह से हास्यास्पद है।”

भारतीय कूटनीतिज्ञों का यह भी कहना है कि पाकिस्तान अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए इतिहास का सहारा ले रहा है। पाकिस्तान ने पिछले कई दशकों में सिंधु नदी के पानी का सही प्रबंधन (Water Management) नहीं किया, जिसके कारण उसका अरबों गैलन पानी समुद्र में बहकर बेकार चला जाता है। अब जब भारत अपने हक के पानी का इस्तेमाल करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत कर रहा है, तो पाकिस्तान को अचानक प्राचीन इतिहास की याद आ रही है।

कूटनीतिक पैंतरेबाजी से नहीं निकलेगा हल

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान का यह नया नैरेटिव केवल एक ‘पब्लिसिटी स्टंट’ या अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति बटोरने की कोशिश है। पानी का बंटवारा इतिहास की किताबों या प्राचीन सभ्यताओं के हवाले से नहीं, बल्कि जमीनी समझौतों और कानूनी दस्तावेजों के आधार पर होता है। पाकिस्तान चाहे हड़प्पा का हवाला दे या मोहनजोदड़ो का, उसे भारत के साथ बैठकर टेबल पर ही बात करनी होगी और अपनी पानी की बर्बादी को रोकना होगा, वरना आने वाले दिनों में उसकी प्यास बुझाना नामुमकिन हो जाएगा।

Leave a Comment