मक्का रक्षा समझौते से 10 साल तक बाहर नहीं निकल सकेंगे पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की, हूती हमलों के बीच गठबंधन की परीक्षा

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Turkish President Tayyip Erdogan, Saudi Crown Prince Mohammed bin Salman and Pakistan’s Prime Minister Shehbaz Sharif pose after signing a joint defense agreement in Mecca. (Photo: Reuters)

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की पूरी शर्तें सामने आने के बाद इस सैन्य गठबंधन को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। समझौते के मुताबिक, तीनों देश इसके लागू होने के बाद शुरुआती 10 साल तक इससे बाहर नहीं निकल सकेंगे। इसके बाद भी किसी सदस्य देश को समझौते से अलग होने के लिए राजनयिक माध्यमों से कम से कम तीन महीने पहले लिखित सूचना देनी होगी।

तुर्की की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, समझौते के 16 अनुच्छेदों वाला पूरा पाठ तुर्की की संसद में मंजूरी के लिए पेश किए जाने से पहले सार्वजनिक किया गया है। इसमें गठबंधन से बाहर निकलने की शर्तों के साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में बाकी देशों को किस तरह सहायता देनी होगी।

यह समझौता ऐसे समय चर्चा में है, जब यमन के हूती विद्रोहियों के मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा का मुद्दा अहम हो गया है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान और तुर्की इस रक्षा समझौते के तहत किस तरह की मदद उपलब्ध कराते हैं।

7 अगस्त को मक्का में हुआ था समझौता

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर 7 अगस्त 2026 को तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए थे।

समझौते की प्रमुख शर्त यह है कि किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होने पर उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। इस प्रावधान का उद्देश्य तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करना और किसी सदस्य की सुरक्षा को खतरा होने पर साझा प्रतिक्रिया का रास्ता तैयार करना है।

समझौते की घोषणा के समय संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया जानकारी साझा करने और रक्षा उत्पादन में सहयोग जैसे विषय भी सामने आए थे। अब इसके पूरे पाठ से यह स्पष्ट हुआ है कि सदस्य देशों के पास समझौते से बाहर निकलने का विकल्प तो है, लेकिन उसके लिए निर्धारित समय और प्रक्रिया का पालन करना होगा।

समझौते से बाहर निकलने के लिए क्या हैं शर्तें?

समझौते के अनुच्छेद 16 में सदस्य देशों के इससे अलग होने की प्रक्रिया का उल्लेख है। इसके अनुसार, समझौता लागू होने के बाद 10 वर्ष पूरे होने पर कोई भी सदस्य देश इससे हट सकता है। इसके लिए कम से कम तीन महीने पहले राजनयिक माध्यमों से लिखित सूचना देना जरूरी होगा।

इसका मतलब यह है कि 10 साल की अवधि समझौते पर हस्ताक्षर करने की तारीख से अपने आप शुरू नहीं होगी। समझौते के लागू होने की तारीख इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतिम अनुमोदन दस्तावेज गठबंधन के सचिवालय में कब जमा किया जाता है।

समझौते में समाप्ति की कोई निश्चित तारीख नहीं रखी गई है। यानी यह किसी तय तारीख पर अपने आप समाप्त नहीं होगा। इसके बजाय, इसके लागू होने के बाद सदस्य देशों के लिए कम से कम शुरुआती 10 साल तक इसमें बने रहने की व्यवस्था की गई है।

इस प्रावधान से रक्षा गठबंधन को दीर्घकालिक आधार देने की कोशिश दिखाई देती है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि तीनों देश समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को किस तरह लागू करते हैं।

हमले की स्थिति में सहयोग जरूरी, लेकिन सैन्य प्रतिक्रिया तय नहीं

समझौते के प्रकाशित पाठ में सामूहिक रक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियों को भी विस्तार से बताया गया है। इसके अनुसार, किसी सदस्य देश पर दूसरे देश या देशों के समूह की ओर से सशस्त्र हमला या सैन्य आक्रामकता होने पर बाकी सदस्यों को तुरंत सहायता देनी होगी।

लेकिन समझौता यह तय नहीं करता कि हर स्थिति में किस देश को कितने सैनिक भेजने होंगे या किस तरह की सैन्य कार्रवाई करनी होगी। सहायता का स्वरूप जरूरतों के आकलन और संबंधित देशों की उपलब्ध क्षमताओं के आधार पर तय किया जाएगा।

इसमें सैन्य क्षमताओं और उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखने की बात कही गई है। इसका अर्थ है कि किसी सदस्य देश को सहायता देने की प्रतिबद्धता मौजूद है, लेकिन सहायता की मात्रा और तरीका परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

इस व्यवस्था से सदस्य देशों को अपनी सैन्य और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की गुंजाइश मिलती है। हालांकि, जरूरत पड़ने पर किस तरह की सहायता दी जाएगी, यह संबंधित स्थिति के आकलन और तीनों देशों के बीच समन्वय पर निर्भर करेगा।

हूती हमले गठबंधन की पहली बड़ी परीक्षा

यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब पर किए जा रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इस समझौते की व्यावहारिक उपयोगिता को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस महीने रियाद में हुई आपात बैठक में तीनों सदस्य देशों ने सऊदी अरब में सैन्य बलों और क्षमताओं की तेजी से तैनाती सुनिश्चित करने पर सहमति जताई थी। इससे संकेत मिलता है कि गठबंधन के सदस्य सऊदी अरब की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर समन्वय बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि, सैन्य सहायता देने की प्रतिबद्धता और किसी दूसरे देश में सीधे युद्ध में शामिल होने के बीच अंतर है। समझौते में सहायता की प्रकृति और मात्रा को परिस्थितियों के अनुसार तय करने की व्यवस्था है। इसलिए केवल सामूहिक रक्षा प्रावधान के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि तीनों देश हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक जैसी सैन्य कार्रवाई करेंगे।

पाकिस्तान ने कहा- सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए जरूरी मदद देंगे

पाकिस्तान के सैन्य प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कहा है कि सऊदी अरब की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और पवित्र स्थलों की सुरक्षा के लिए इस्लामाबाद जरूरी सहायता उपलब्ध करा रहा है।

उन्होंने एक साक्षात्कार में सऊदी अरब के पवित्र स्थलों की सुरक्षा को पाकिस्तान के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता और गैर-समझौतावादी विषय बताया। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि पाकिस्तान किस तरह की सैन्य या अन्य सहायता दे रहा है और उसकी मात्रा कितनी है।

पाकिस्तान के इस बयान से सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर उसकी प्रतिबद्धता सामने आती है, लेकिन इससे यह पुष्टि नहीं होती कि पाकिस्तान हूती विद्रोहियों के खिलाफ यमन में अपने सैनिक भेजने जा रहा है।

पाकिस्तान ने कहा है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत तैनात उसके सैनिक सऊदी अरब के क्षेत्र की रक्षा करेंगे और हूती विद्रोहियों पर हमला करने के लिए यमन में प्रवेश नहीं करेंगे। इस रुख को समझौते के सैन्य दायित्वों और पाकिस्तान की अपनी नीतिगत सीमाओं के संदर्भ में देखा जा रहा है।

तुर्की की भूमिका हथियारों और खुफिया सहयोग तक सीमित रह सकती है

तुर्की की ओर से इस गठबंधन के तहत सहायता का स्वरूप भी चर्चा में है। एक तुर्की अधिकारी ने Reuters को बताया कि अंकारा का योगदान सैन्य उपकरणों, खुफिया जानकारी साझा करने और हथियार प्रणालियों तक सीमित रहने की उम्मीद है।

तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इस समझौते को रक्षात्मक बताया है। उनका कहना है कि तुर्की किसी दूसरे देश में हमला करने के लिए अपने सैनिक नहीं भेजेगा।

इससे संकेत मिलता है कि तुर्की सऊदी अरब की रक्षा में सहयोग देने के लिए तैयार हो सकता है, लेकिन उसकी भूमिका सीधे सैन्य कार्रवाई के बजाय उपकरण, सूचना और रक्षा प्रणालियों से जुड़ी रह सकती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर तुर्की की अंतिम सहायता योजना की पूरी पुष्टि नहीं की जा सकती।

इस तरह पाकिस्तान और तुर्की दोनों की ओर से सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर समर्थन सामने आया है, लेकिन दोनों देशों के संभावित योगदान का स्वरूप अलग हो सकता है।

तीनों देशों में समझौते को मंजूरी देने की प्रक्रिया अलग

मक्का रक्षा समझौते को लागू करने में तीनों देशों की घरेलू प्रक्रियाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

तुर्की में समझौते को लागू करने के लिए संसद की मंजूरी आवश्यक है। इसके अलावा, विदेशों में सैनिकों की तैनाती के लिए भी अलग से संसदीय अनुमति की जरूरत होती है।

सऊदी अरब में अंतरराष्ट्रीय संधियों को मंजूरी देने की प्रक्रिया अलग है। वहां पूर्ण राजशाही व्यवस्था के तहत अंतरराष्ट्रीय समझौतों को संसदीय मतदान के बजाय शाही फरमान के माध्यम से मंजूरी दी जाती है।

पाकिस्तान में इस समझौते को लेकर संसद की भूमिका और यमन संघर्ष में शामिल होने की आशंका पर चर्चा हुई है। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय का कहना है कि इस समझौते के तहत सैनिकों की तैनाती के लिए संसदीय मंजूरी जरूरी नहीं है और मौजूदा कानूनों तथा सरकारी प्रक्रियाओं के तहत ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं।

हालांकि, इन प्रक्रियाओं का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी परिस्थिति में सैन्य तैनाती अपने आप हो जाएगी। वास्तविक तैनाती और सहायता के फैसले संबंधित देशों की नीतियों, कानूनी व्यवस्थाओं और सुरक्षा परिस्थितियों पर निर्भर करेंगे।

यमन संघर्ष को लेकर पाकिस्तान का पुराना रुख

यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान की नीति का पुराना संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 2015 में पाकिस्तान की संसद ने सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन किया था, लेकिन यमन में लड़ाई के लिए पाकिस्तानी सैनिक भेजने की प्रतिबद्धता से दूरी बनाए रखी थी।

वर्तमान समझौते के तहत भी पाकिस्तान ने कहा है कि उसके सैनिक सऊदी अरब की क्षेत्रीय रक्षा के लिए तैनात होंगे और हूती विद्रोहियों पर हमला करने के लिए यमन में प्रवेश नहीं करेंगे।

यह रुख बताता है कि सऊदी अरब की सुरक्षा को समर्थन देने और यमन में सीधे सैन्य संघर्ष का हिस्सा बनने को पाकिस्तान अलग-अलग विषयों के रूप में देख रहा है।

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का पूरा पाठ सामने आने से तीनों देशों की प्रतिबद्धताओं, उससे बाहर निकलने की प्रक्रिया और सैन्य सहायता से जुड़े प्रावधानों पर अधिक स्पष्टता मिली है। शुरुआती 10 वर्षों तक समझौते से बाहर नहीं निकल पाने की शर्त इसे दीर्घकालिक व्यवस्था बनाती है, जबकि सहायता की मात्रा और प्रकृति तय करने में सदस्य देशों को लचीलापन दिया गया है।

अब इस गठबंधन की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात से तय होगी कि सऊदी अरब की सुरक्षा से जुड़ी मौजूदा चुनौतियों के दौरान पाकिस्तान और तुर्की किस तरह का सहयोग देते हैं। हूती हमलों के बीच सैन्य सहायता, खुफिया जानकारी साझा करने और रक्षा उपकरणों की उपलब्धता जैसे कदम इस समझौते की व्यावहारिक परीक्षा होंगे।

फिलहाल तीनों देशों ने रक्षा सहयोग का ढांचा तैयार किया है, लेकिन सैनिकों की तैनाती और सैन्य कार्रवाई के बारे में अंतिम स्थिति को लेकर उपलब्ध बयानों में सीमाएं स्पष्ट की गई हैं। इसलिए इस समझौते को सीधे किसी संयुक्त युद्ध अभियान की घोषणा के रूप में देखना सही नहीं होगा।

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