एवियन-लेस-बैंस (फ्रांस): फ्रांस के खूबसूरत पहाड़ी रिसॉर्ट शहर एवियन-लेस-बैंस में आयोजित हो रहे ग्रुप ऑफ सेवन (G7) शिखर सम्मेलन के दौरान एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वही चिर-परिचित, आक्रामक और बेबाक अंदाज देखने को मिला। वैश्विक आर्थिक सुरक्षा पर आयोजित एक बेहद महत्वपूर्ण कार्य सत्र (Working Session) के दौरान जब सभी शक्तिशाली देशों के राष्ट्रप्रमुख अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठ रहे थे, तब ट्रंप ने कमरे में मौजूद वैश्विक नेताओं और मीडिया कर्मियों की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “बॉस तो मैं ही हूँ” (I’m the boss)।

ट्रंप के इस अति-आत्मविश्वास से भरे बयान ने वहां मौजूद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और कनाडा के पीएम मार्क कार्नी सहित अन्य दिग्गज नेताओं को हंसने पर मजबूर कर दिया। हालांकि, यह केवल एक हल्के-फुल्के पल की बात नहीं थी; यह चुटीला बयान समिट के उस कड़वे सच और प्रभाव को भी साफ तौर पर दर्शाता है कि पश्चिमी दुनिया की आर्थिक और भू-राजनीतिक नीतियों की चाबी काफी हद तक अमेरिकी रुख पर ही टिकी हुई है। ‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस हंसते-मुस्कुराते माहौल के बीच बंद कमरों में जी-7 नेताओं ने यूक्रेन संकट, ईरान शांति समझौते और चीन की आर्थिक आक्रामकता को लेकर कई बड़े और ऐतिहासिक नीतिगत फैसले लिए हैं।
यूक्रेन पर बदला ट्रंप का रुख: रूस पर नए और कड़े प्रतिबंध
इस बार के जी-7 शिखर सम्मेलन में सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव यूक्रेन के मुद्दे पर देखने को मिला है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और उनके यूरोपीय सहयोगी इस समिट में राष्ट्रपति ट्रंप को यह समझाने में काफी हद तक सफल रहे हैं कि युद्ध के मैदान में अब स्थितियां बदल रही हैं और यूक्रेन की सेना मजबूती से पलटवार कर रही है। जेलेंस्की का मुख्य उद्देश्य ट्रंप को यह आश्वस्त करना था कि रूस इस स्थिति में बिल्कुल नहीं है कि वह अपनी शर्तों पर कोई शांति समझौता थोप सके।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इस बदलाव की पुष्टि करते हुए संवाददाताओं से कहा:
“संयुक्त राज्य अमेरिका और विशेष रूप से राष्ट्रपति ट्रंप के रुख में एक स्पष्ट और बड़ा बदलाव आया है। अब रूस के प्रति उनका दृष्टिकोण कहीं अधिक सख्त, व्यावहारिक और युद्ध के मैदान की वास्तविक स्थिति के अनुकूल है।”
इस सहमति के बाद, जी-7 देशों ने एक साझा बयान जारी कर यूक्रेन को वित्तीय और सैन्य सहायता जारी रखने का संकल्प लिया। साथ ही, रूस की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने के लिए नए और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की एक और सूची को मंजूरी दी गई। हालांकि, कूटनीतिज्ञों का मानना है कि मॉस्को को बातचीत की मेज पर लाने की योजना पूरी तरह से ट्रंप की निरंतर प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी, जो अक्सर अप्रत्याशित रही है।
ईरान शांति समझौते पर ट्रंप की सीधी और खुली चेतावनी
सत्र के दौरान जी-7 के शासनाध्यक्षों ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए प्रारंभिक शांति समझौते और ‘मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (MoU) का स्वागत किया। इस समझौते के बाद, पश्चिमी देशों ने ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ (Strait of Hormuz) पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ऊर्जा आपूर्ति मार्गों में विविधता लाने और अपने तेल भंडारों को बढ़ाने की रणनीति पर भी चर्चा की, क्योंकि ईरान ने अमेरिका के साथ युद्ध के दौरान इस रणनीतिक जलमार्ग को लंबे समय तक अवरुद्ध करके रखा था।
हालांकि, ट्रंप ने इस वैश्विक मंच से भी ईरान को अपने खास अंदाज में चेतावनी देने से गुरेज नहीं किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह समझौता अभी अंतिम नहीं है:
“अगर मुझे यह समझौता पसंद नहीं आया, या उन्होंने (ईरान ने) सही ढंग से व्यवहार नहीं किया, तो हम सीधे उनके सिर के ठीक बीच में दोबारा बम गिराना शुरू कर देंगे, समझे आप?”
यूरोपीय सहयोगियों ने सार्वजनिक रूप से तो इस शांति पहल का समर्थन किया है, लेकिन बंद कमरों में कूटनीतिज्ञों ने आगाह किया है कि मध्य पूर्व में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल नेटवर्क और उसके प्रॉक्सी संगठनों (जैसे हिजबुल्लाह और हुथी) के प्रभाव को पूरी तरह से समाप्त करना एक बेहद जटिल चुनौती बनी हुई है।
चीन की ‘predatory competition’ पर नकेल: क्रिटिकल मिनरल्स ब्लॉक
जी-7 देशों के एजेंडे में सबसे बड़ा आर्थिक मुद्दा चीन का मुकाबला करना था। फ्रांस ने विशेष रूप से वैश्विक व्यापार में फैले असंतुलन और चीन की ‘शिकारी प्रतिस्पर्धा’ (Predatory Competition) पर चिंता व्यक्त की। फ्रांसीसी अधिकारियों ने इस वैश्विक आर्थिक असंतुलन को बहुत ही सरल शब्दों में परिभाषित किया: “चीन उत्पादन बहुत ज्यादा करता है, अमेरिका उपभोग बहुत ज्यादा करता है और यूरोपीय देश निवेश बहुत कम करते हैं।”
वर्तमान में यूरोप, चीन के लगभग 400 बिलियन डॉलर (360 बिलियन यूरो) के भारी-भरकम व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) से बेहद परेशान है। इसे काउंटर करने के लिए दो मुख्य रणनीतियों पर चर्चा हुई:
- दुर्लभ खनिजों पर निर्भरता कम करना: पिछले दिनों बीजिंग द्वारा रेयर अर्थ्स (विशेष रूप से परमानेंट मैग्नेट्स) के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद पूरी दुनिया के उद्योग ठप होने की कगार पर आ गए थे। इसके जवाब में, अमेरिका ने साल 2026 की शुरुआत में एक नया ‘क्रिटिकल मिनरल्स ट्रेडिंग ब्लॉक’ बनाने का प्रस्ताव रखा था। इस समिट में पश्चिमी निवेशकों को चीनी जवाबी कार्रवाइयों और डंपिंग से बचाने के लिए सब्सिडी, मूल्य समर्थन (Price Support) और गारंटीशुदा खरीद जैसे उपायों पर सहमति बनाने की कोशिश की गई।
- तकनीकी संप्रभुता: चीन ने यूरोपीय संघ के इन कदमों के खिलाफ मजबूत जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है, लेकिन जी-7 देश अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) को सुरक्षित करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं।
लंच पर एआई (AI) और टेक दिग्गजों के साथ महामंथन
शिखर सम्मेलन का एक और मुख्य आकर्षण रहा वर्किंग लंच, जिसमें वैश्विक कूटनीतिज्ञों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों के प्रमुख शामिल हुए। इस खास सत्र में ‘ओपनएआई’ (OpenAI) के सह-संस्थापक सैम ऑल्टमैन और ‘एंथ्रोपिक’ (Anthropic) के सीईओ डारियो अमोदेई भी मौजूद रहे।
नेताओं ने तकनीकी दिग्गजों के साथ इस बात पर गंभीर चर्चा की कि एआई बॉट्स और स्वायत्त एजेंटों (AI Agents) की कानूनी जवाबदेही कैसे तय की जाए। इसके अलावा, वर्तमान डिजिटल युग में एआई द्वारा परोसे जा रहे सच और झूठ (Deepfakes और सोफिस्टिकेटेड मिसइन्फॉर्मेशन) से वैश्विक लोकतंत्रों और राष्ट्रों की सुरक्षा को कैसे बचाया जाए, इस पर पहले व्यावहारिक नियमों की रूपरेखा तैयार की गई। कुल मिलाकर, फ्रांस का यह समिट ट्रंप की वन-मैन शो जैसी बयानबाजी और पश्चिमी देशों के गंभीर रणनीतिक फैसलों का एक अनूठा मिश्रण साबित हुआ है।