US-Iran Peace Deal: ट्रंप के बड़े यू-टर्न से नेतन्याहू बैकफुट पर, क्या ‘बीबी’ साबित हुए इस जंग के सबसे बड़े लूजर?

नई दिल्ली : मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) के सियासी गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने एक अंतरिम शांति समझौते पर दस्तखत कर दिए हैं, जिसने महीनों से चली आ रही जंग को अप्रत्याशित मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। ट्रंप भले ही इसे अमेरिका के लिए एक ऐतिहासिक जीत बता रहे हों, लेकिन इस फैसले ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को पूरी तरह अलग-थलग और राजनीतिक रूप से असुरक्षित कर दिया है।

US President Donald Trump and Israeli PM Benjamin Netanyahu

इस समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में यह बहस तेज हो गई है कि क्या ‘बीबी’ यानी बेंजामिन नेतन्याहू इस पूरी जंग के सबसे बड़े लूजर साबित हुए हैं। यह हकीकत नेतन्याहू के लिए एक कड़वी गोली की तरह है, क्योंकि आगामी अक्टूबर में इजरायल में बेहद कड़े और हाई-स्टेक्स आम चुनाव होने वाले हैं, और उनके पास जनता को दिखाने के लिए कोई ठोस कामयाबी नहीं बची है।

कैसे पलटा पूरा खेल और क्यों साइडलाइन हुए नेतन्याहू

बेंजामिन नेतन्याहू का यह पुराना सपना रहा है कि वे ईरान पर सीधा हमला कर उसे और उसके प्रॉक्सी संगठनों (जैसे हिजबुल्लाह और हमास) को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दें। ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद उन्हें लगा कि उनका यह मौका आ गया है, और इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर भीषण हवाई हमले भी शुरू किए थे।

लेकिन पासा तब पलट गया जब ईरान ने जवाबी कार्रवाई में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को ब्लॉक कर दिया, जिससे दुनिया भर में तेल की सप्लाई ठप होने लगी। अमेरिका के भीतर आर्थिक मंदी की आहट और आगामी मिडटर्म चुनावों में अपनी गिरती रेटिंग को देखकर ट्रंप ने इजरायल को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाकर बिना इजरायल की सहमति के ईरान के साथ जल्दबाजी में यह शांति समझौता फाइनल कर लिया।

इजरायल का एक भी मकसद नहीं हुआ पूरा

इस शांति समझौते का सबसे बड़ा सच यह है कि युद्ध की शुरुआत में इजरायल और अमेरिका ने जो लक्ष्य तय किए थे, उनमें से एक भी पूरा नहीं हो सका। ईरान का शासन तंत्र आज भी पूरी तरह सुरक्षित है और उसका अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (Highly Enriched Uranium) का जखीरा देश के भीतर ही मौजूद है।

इससे भी बड़ा झटका इजरायल को तब लगा जब ट्रंप ने साफ कह दिया कि अमेरिका अब तेहरान पर उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को बंद करने का कोई दबाव नहीं बनाएगा। इसके अलावा, इस डील में लेबनान को भी शामिल किया गया है, जिसके तहत इजरायल अब वहां कोई सैन्य ऑपरेशन नहीं चला पाएगा। बदले में ईरान केवल अपने प्रॉक्सी संगठनों को रोकने का एक सामान्य आश्वासन दे रहा है।

‘नए मिडिल ईस्ट’ के वादे पर भारी पड़ा जमीनी सच

नेतन्याहू ने इजरायली जनता से जिस ‘नए मिडिल ईस्ट’ का वादा किया था, उसकी मौजूदा तस्वीर बेहद धुंधली है। तीन साल के लंबे संघर्ष के बाद भी हमास अभी भी गाजा के एक हिस्से को नियंत्रित कर रहा है, हिजबुल्लाह लेबनान में सक्रिय है, और ईरान का हौसला पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि ट्रंप को सिर्फ अपनी वाहवाही और नोबेल शांति पुरस्कार की चाहत है, जिसके लिए उन्होंने अपने सबसे करीबी दोस्त नेतन्याहू को भी मझधार में छोड़ दिया।

कुछ महीने पहले तक नेतन्याहू को ‘हीरो’ बताने वाले ट्रंप के सुर अब बदल चुके हैं और वे निजी बातचीत में उन्हें ‘सनकी’ और ‘बेहद पेचीदा इंसान’ कह रहे हैं। अक्टूबर 2023 में हमास के हमले को न रोक पाना इजरायली खुफिया एजेंसी की सबसे बड़ी नाकामी थी, और नेतन्याहू ईरान पर जीत हासिल कर अपनी उस छवि को सुधारना चाहते थे, लेकिन उनका यह आखिरी जुआ भी नाकाम साबित हुआ।

इजरायल में चौतरफा घिरे नेतन्याहू, विपक्ष का तीखा हमला

इस समझौते की खबर आते ही इजरायल की घरेलू राजनीति में भूचाल आ गया है और विपक्षी दल नेतन्याहू पर हमलावर हो गए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक ने सीधे शब्दों में कहा है कि इजरायल आज नेतन्याहू के अहंकार और रणनीतिक अंधेपन की कीमत चुका रहा है, जिससे ईरान मजबूत और इजरायल कमजोर हुआ है।

विपक्ष के नेता याइर लापिड ने इसे इजरायल की विदेश और सुरक्षा नीति की सबसे बड़ी नाकामियों में से एक बताया है। वहीं, डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता याइर गोलन ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि नेतन्याहू हमास, ईरान और हिजबुल्लाह के लिए तो फायदेमंद साबित हो सकते हैं, लेकिन वे इजरायल के लिए बिल्कुल अच्छे नहीं हैं।

फिलहाल चुनाव पूर्व सर्वेक्षण भी यह दिखा रहे हैं कि नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन हार की कगार पर है। इसके साथ ही, द हेग (अंतरराष्ट्रीय न्यायालय) में गाजा में युद्ध अपराधों को लेकर उनके खिलाफ अरेस्ट वारंट भी जारी हो चुका है। नेतन्याहू भले ही खुद को इजरायल का रक्षक बताकर डैमेज कंट्रोल में जुटे हों, लेकिन खाली हाथ और बदले हुए वैश्विक समीकरणों के बीच उनका राजनीतिक भविष्य उनके जीवन के सबसे अंधकारमय दौर में पहुंच चुका है।

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