Maharashtra Politics: 6 बार टूट चुकी है शिवसेना, सिर्फ उद्धव ठाकरे के दौर में ही हुए 4 बड़े विद्रोह

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मुंबई: महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना का इतिहास जितना दबदबे वाला रहा है, उतना ही अंदरूनी बगावतों से भी भरा रहा है। बाल ठाकरे के दौर से शुरू हुई इस पार्टी ने अपने सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। आज जब हम इस संगठन के इतिहास को पलटकर देखते हैं, तो पता चलता है कि शिवसेना अब तक कुल 6 बार टूट का शिकार हो चुकी है। दिलचस्प बात यह है कि इन 6 बड़ी बगावतों में से 4 तो अकेले उद्धव ठाकरे के कार्यकाल के दौरान ही हुईं। इन टूट के चलते न सिर्फ पार्टी कमजोर हुई, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति को कई नई पार्टियां और नए क्षत्रप भी मिले, जिन्होंने आगे चलकर सत्ता की चाबी अपने हाथ में ली।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवसेना का ढांचा हमेशा से एक कड़क और अनुशासित संगठन का रहा है, लेकिन इसके बावजूद समय-समय पर महत्वाकांक्षाओं के टकराव ने इसमें बड़े बिखराव पैदा किए। जब भी पार्टी के भीतर किसी बड़े नेता को लगा कि उसकी अनदेखी हो रही है या नेतृत्व का झुकाव किसी और तरफ है, तो उसने बगावत का रास्ता चुना। इन बगावतों ने न केवल शिवसेना के भीतर के समीकरणों को बदला, बल्कि पूरे महाराष्ट्र की राजनीतिक दिशा और दशा को भी एक नया मोड़ दे दिया।

छगन भुजबल ने रखी थी बगावत की पहली बुनियाद

शिवसेना में पहली सबसे बड़ी बगावत साल 1991 में हुई थी, जब पार्टी के फायरब्रांड नेता छगन भुजबल ने बगावती तेवर अपनाए थे। मंडल कमीशन के मुद्दे पर बाल ठाकरे से मतभेद होने के बाद भुजबल ने अपने साथी विधायकों के साथ पार्टी छोड़ दी थी। छगन भुजबल का अलग होना शिवसेना के लिए एक बड़ा वैचारिक और संगठनात्मक झटका था। उन्होंने बाद में कांग्रेस का दामन थाम लिया और आगे चलकर जब शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई, तो भुजबल उनके साथ चले गए।

भुजबल की यह बगावत इसलिए भी खास थी क्योंकि इससे पहले माना जाता था कि शिवसेना से कोई भी नेता बगावत करने की हिम्मत नहीं कर सकता। बाल ठाकरे का खौफ और उनका अनुशासन ऐसा था कि कोई भी उनके फैसले के खिलाफ जाने की सोच भी नहीं सकता था। लेकिन भुजबल ने इस धारणा को तोड़ा और अपने साथ 18 विधायकों को लेकर पार्टी से अलग हो गए, जिससे शिवसेना को पहली बार विधानसभा के भीतर एक बड़े संकट का सामना करना पड़ा।

नारायण राणे की विदाई और राज ठाकरे का अपना रास्ता

साल 2005 में शिवसेना को एक साल के भीतर दो बड़े झटके लगे, जिसने ठाकरे परिवार की चिंताएं बढ़ा दी थीं। पहले पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने उद्धव ठाकरे की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए बगावत की और अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए। राणे का आरोप था कि पार्टी के भीतर जमीनी नेताओं की जगह उन लोगों को तवज्जो दी जा रही है जो सिर्फ मातोश्री के करीबी हैं।

अभी पार्टी इस झटके से संभल भी नहीं पाई थी कि बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने भी पार्टी को अलविदा कह दिया। राज ठाकरे का जाना सबसे भावुक और राजनीतिक रूप से नुकसानदेह था। राज ठाकरे को बाल ठाकरे की राजनीतिक परछाई माना जाता था और उनके भाषण देने की शैली बिल्कुल अपने चाचा जैसी थी। उन्होंने साल 2006 में अपनी नई पार्टी ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ (MNS) का गठन कर लिया, जिसने बाद में शिवसेना के मराठी मानुष वाले पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई।

उद्धव ठाकरे के कमान संभालते ही शुरू हुआ टूट का सिलसिला

जब उद्धव ठाकरे ने पार्टी की पूरी कमान अपने हाथ में ली, तो उनके सामने संगठन को एकजुट रखने की सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन उनके कार्यकाल में असंतोष की चिंगारी धीरे-धीरे सुलगती रही, जिसने बाद में एक बड़े राजनीतिक विस्फोट का रूप ले लिया। उद्धव के दौर की शुरुआती बगावतों में कुछ छोटे गुट और स्थानीय नेता अलग हुए, जिससे पार्टी को जमीनी स्तर पर काफी नुकसान उठाना पड़ा।

उद्धव ठाकरे की कार्यशैली को लेकर अक्सर यह कहा जाता था कि वे अपने पिता बाल ठाकरे की तरह आक्रामक नहीं थे, बल्कि उनका रवैया अधिक सौम्य और कॉर्पोरेट जैसा था। यही बात शिवसेना के पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रही थी। उन्हें लगता था कि पार्टी अपनी मूल आक्रामक पहचान खो रही है। इसी असंतोष का फायदा उठाकर पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा नेतृत्व के खिलाफ लामबंद होने लगा था।

एकनाथ शिंदे की बगावत ने बदल दिया पूरा इतिहास

साल 2022 में आया भूचाल शिवसेना के इतिहास का सबसे बड़ा संकट साबित हुआ। एकनाथ शिंदे की अगुवाई में हुई इस ऐतिहासिक बगावत ने न सिर्फ उद्धव ठाकरे से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली, बल्कि पूरी पार्टी और उसका सिंबल (तीर-कमान) भी उनके हाथ से निकल गया। एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के इतिहास की सबसे बड़ी और प्रभावी सर्जिकल स्ट्राइक की थी। उन्होंने पार्टी के दो-तिहाई से ज्यादा विधायकों और सांसदों को अपने पाले में कर लिया, जिससे दल-बदल कानून के तहत उनकी शिवसेना को ही असली शिवसेना मान लिया गया।

इस टूट ने ठाकरे परिवार के उस एकाधिकार को चुनौती दी, जो पिछले कई दशकों से मातोश्री से चलता आ रहा था। एकनाथ शिंदे ने यह दावा किया कि वे ही असली बाल ठाकरे के विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन करके पार्टी की विचारधारा से समझौता कर लिया है। इस बगावत के बाद शिवसेना दो धड़ों में पूरी तरह बंट गई और कानूनी लड़ाई में भी उद्धव ठाकरे को करारा झटका लगा।

‘ऑपरेशन टाइगर’ और सांसदों के बगावत की नई कहानी

मौजूदा समय में भी उद्धव ठाकरे का संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में महाराष्ट्र की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर कयासबाजी तेज हो गई है। चर्चा है कि शिवसेना (यूबीटी) के कुल 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसद पार्टी छोड़ने और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थामने की तैयारी में हैं। इन सांसदों के नाम भी सामने आ रहे हैं, जिनमें नांदेड़, पुणे और मुंबई के कुछ बड़े चेहरे शामिल बताए जा रहे हैं।

अगर यह टूट हकीकत में बदलती है, तो यह उद्धव ठाकरे के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका होगा। हालांकि संजय राउत और अनिल देसाई जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेता लगातार डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं और इन दावों को खारिज कर रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत और सांसदों की बैठकों से दूरी यह साफ संकेत दे रही है कि पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है। शिवसेना के इस लंबे इतिहास से साफ है कि सत्ता और संगठन के भीतर जब भी नेतृत्व को लेकर खींचतान बढ़ी है, तब-तब इस पार्टी को टूटना पड़ा है।

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