फिल्म: वेलकम टू द जंगल (Welcome to the Jungle)
निर्देशक: अहमद खान
मुख्य कलाकार: अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, दिशा पाटनी, जैकलीन फर्नांडिस, अरशद वारसी, जैकी श्रॉफ, जॉनी लीवर, राजपाल यादव, रवीना टंडन, फरीदा जलाल, किरण कुमार
लेखक: नीरज वोरा
रेटिंग: 2.5 स्टार

‘वेलकम’ फ्रैंचाइज़ की तीसरी किस्त ‘वेलकम टू द जंगल’ बड़े पर्दे पर दस्तक दे चुकी है। यह उस शैली की फिल्म है जो न तो खुद को गंभीरता से लेती है और न ही आपसे ऐसी कोई उम्मीद करती है। साफ शब्दों में कहें तो यह फिल्म बॉक्स ऑफिस और दर्शकों के प्योर टाइमपास मनोरंजन के लिए बनाई गई है और काफी हद तक अपने इस मक़सद में कामयाब भी रहती है। इस फिल्म को देखने का एक ही मूलमंत्र है—जितनी कम उम्मीद लेकर थिएटर जाएंगे, उतना ही ज्यादा हंसकर और एंटरटेन होकर बाहर लौटेंगे।
कहानी का ताना-बाना (Premise)
फिल्म की कहानी एक अनोखे और मजेदार आइडिया पर आधारित है। एक बिजनेसमैन है जो भारी-भरकम टैक्स देने से बचना चाहता है। अपने धंधे में भारी घाटा (Loss) दिखाने के लिए वह एक मास्टर प्लान बनाता है—2000 करोड़ रुपये लगाकर एक ‘महाफ्लॉप’ फिल्म बनाने का। इस फ्लॉप फिल्म को बनाने के लिए वह फिल्म इंडस्ट्री के सबसे खराब, आउट-ऑफ-मार्केट और लुट-पिट चुके लोगों को काम पर रखता है।
इस क्रेजी क्रू में शामिल हैं:
- देव और दास: एक ऐसी डायरेक्टर जोड़ी जिनके पास कोई काम नहीं है और वे मजबूरी में रील्स बनाकर गुजारा कर रहे हैं।
- एक फ्लॉप सुपरस्टार (अक्षय कुमार): जो अब भोजपुरी फिल्मों में आइटम बॉय बनने को मजबूर है।
- नैनसुख: एक ऐसा सिनेमैटोग्राफर जिसे खुद कुछ दिखाई नहीं देता।
- हीरोइन: खुद प्रोड्यूसर की नखरेबाज बेटी।
मेकर्स के पास इस सेटअप के जरिए फिल्म इंडस्ट्री के काम करने के तौर-तरीकों पर एक तीखा और मजेदार व्यंग्य (Satire) कसने का बेहतरीन मौका था। शुरुआत में ऐसा लगता भी है, लेकिन जल्द ही फिल्म हॉलीवुड की ‘ट्रॉपिक थंडर’ की बेसिक आउटलाइन पर चलते हुए स्वर्गीय नीरज वोरा की सिग्नेचर कॉमेडी की दुनिया में समा जाती है और अपने पुराने लाउड, डंब और ओवर-द-टॉप ज़ोन में चली जाती है।
सेल्फ-रेफरेंशियल ह्यूमर और अक्षय कुमार का अनोखा अंदाज
‘वेलकम टू द जंगल’ की सबसे बड़ी ताकत इसका सेल्फ-डिप्रेकेटरी ह्यूमर (खुद का मजाक उड़ाना) और मेटा रेफरेंस हैं। चूंकि आजकल सिनेमा में मिलिट्री और देशभक्ति से लबरेज फिल्मों का दौर चल रहा है, मेकर्स ने फिल्म का एक बड़ा हिस्सा इसी के इर्द-गिर्द बुना है और इस जॉनर की फिल्मों पर जमकर स्पूफ (मजाक) बनाया है।
फिल्म में अक्षय कुमार ने ‘राजीव’ नाम के एक फ्लॉप एक्टर का किरदार निभाया है। फिल्म का सबसे मारक और चर्चित डायलॉग भी अक्षय के हिस्से ही आया है, जहां उनका किरदार अपनी जान बचाने के लिए गांव वालों की जान दांव पर लगाने को तैयार हो जाता है और कहता है:
“मैं कोई आर्मीवाला नहीं हूं। देशभक्ति से मुझे कोई लेना-देना नहीं। मैं एक भांड हूं, जो नाच-गाकर पैसे कमाता है। इसलिए मुझे जाने दो।”
यह लाइन इसलिए भी ज्यादा मजेदार और अचूक लगती है क्योंकि असल जिंदगी में अक्षय कुमार ने कई देशभक्ति और सोशल मैसेज वाली फिल्में की हैं। हालांकि, एक प्रमोशनल इंटरव्यू के दौरान जब एक पत्रकार ने इस किरदार को उनकी रीयल लाइफ और हालिया फ्लॉप फिल्मों के दौर से जोड़ने की कोशिश की, तो अक्षय ने इसे साफ खारिज करते हुए कहा कि यह सिर्फ एक काल्पनिक कैरेक्टर है। लेकिन थिएटर में यह सीन दर्शकों को खूब गुदगुदाता है।
कलाकारों की फौज और फनी मोमेंट्स
फिल्म में कहानी या वन-लाइनर्स से ज्यादा एक्टर्स की फौज खड़ी की गई है। मेकर्स का सिंपल फॉर्मूला है—जहां जोक्स काम न आएं, वहां स्क्रीन पर ढेर सारे हेलीकॉप्टरों की एंट्री करा दो। इसके बावजूद, फिल्म में कुछ सीन्स बेहद फनी बन पड़े हैं, जिसका श्रेय फरीदा जलाल और किरण कुमार को जाता है।
फरीदा जलाल ने उस गांव की एक बूढ़ी महिला का रोल प्ले किया है, जहां इस अजीबोगरीब फिल्म की शूटिंग चल रही होती है। यहीं से कहानी में एक बड़ा कन्फ्यूजन पैदा होता है, जो फिल्म का क्रक्स (मुख्य टर्निंग पॉइंट) बनता है। यह कन्फ्यूजन फिल्म के किरदारों की नैतिकता को कटघरे में खड़ा करता है और ढेर सारी सिचुएशनल कॉमेडी पैदा करता है। सुनील शेट्टी, अरशद वारसी, राजपाल यादव और जॉनी लीवर जैसे मंझे हुए कलाकार अपनी कॉमिक टाइमिंग से स्क्रीन पर समां बांधने की पूरी कोशिश करते हैं।
संपादन और पेस (Editing and Pace)
पौने तीन घंटे (लगभग 2 घंटे 45 मिनट) की लंबी अवधि होने के बावजूद फिल्म कहीं भी बोझिल या सुस्त महसूस नहीं होती। फिल्म की रफ्तार को बनाए रखने के लिए इसके एडिटर नितिन पाठक की तारीफ होनी चाहिए। उन्होंने अहमद खान के इस क्रेजी और बिखरे हुए रॉ मैटेरियल को इतनी खूबसूरती से काटा और तराशा है कि फिल्म की गति थमती नहीं है।
देखें या न देखें?
‘वेलकम टू द जंगल’ पिछले कुछ समय में आई अक्षय कुमार की कॉमेडी फिल्मों के मुकाबले काफी बेहतर, तेज और मनोरंजक है। यह एक शुद्ध ‘ब्रेनरॉट’ (बिना दिमाग खर्च किए देखने वाली) कॉमेडी है। अगर आप इसमें लॉजिक, गहरा सबटेक्स्ट या किसी बड़े सामाजिक संदेश की तलाश करेंगे, तो निराश होंगे। लेकिन अगर आप वीकेंड पर अपने इंटेलेक्ट (बुद्धिमत्ता) को थिएटर के बाहर सरेंडर करके सिर्फ हंसने के मूड से जा रहे हैं, तो अहमद खान के इस ‘जंगल’ में आपका स्वागत है!