यूपी चुनाव 2027: ‘जयंत एपिसोड’ का दर्द और चंद्रशेखर पर अविश्वास; अखिलेश यादव की नई सियासी बिसात

‘जयंत एपिसोड’ का दर्द और चंद्रशेखर पर अविश्वास; अखिलेश यादव की नई सियासी बिसात

Uttar Pradesh / यूपी चुनाव 2027 / उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन और नेताओं के आपसी रिश्ते मौसम से भी ज्यादा तेजी से बदलते हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद अब सूबे के सभी राजनीतिक दलों का पूरा फोकस 2027 के विधानसभा चुनाव पर टिक गया है। इसी बीच, समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव, आजाद समाज पार्टी (आसपा) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के जयंत चौधरी के बीच के त्रिकोणीय राजनीतिक समीकरणों को लेकर एक बेहद दिलचस्प वाकया सामने आया है।

वरिष्ठ पत्रकार आस मोहम्मद कैफ ने ‘यूपी तक’ पर बातचीत के दौरान इन बड़े नेताओं के बीच परदे के पीछे चल रही शह और मात के खेल का एक रोचक किस्सा साझा किया है, जो बताता है कि अखिलेश यादव अब गठबंधन के मामले में फूंक-फूंक कर कदम क्यों रख रहे हैं।

“अब किसी पर भरोसा करना मुश्किल…”

गठबंधन की राजनीति में अक्सर दिल के रिश्ते नहीं, बल्कि सियासी नफा-नुकसान मायने रखता है। वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक, एक समय चंद्रशेखर आजाद ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव को फोन किया था। उस बातचीत के दौरान अखिलेश यादव का दर्द छलक उठा और उन्होंने चंद्रशेखर से बेहद साफ शब्दों में अपनी दुविधा साझा की।

“मैं आपका व्यक्तिगत तौर पर बहुत सम्मान करता हूँ, लेकिन जयंत चौधरी वाले एपिसोड के बाद अब मेरे लिए राजनीति में किसी पर भी इतनी आसानी से भरोसा करना बहुत मुश्किल हो गया है।” — अखिलेश यादव (चंद्रशेखर आजाद से फोन पर)

अखिलेश यादव का यह अविश्वास अकारण नहीं है। इसके पीछे साल 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुआ वह बड़ा उलटफेर है, जिसने सपा को गहरी राजनीतिक चोट पहुंचाई थी।

क्या था ‘जयंत चौधरी एपिसोड’ जिसने अखिलेश को तोड़ा?

एक दौर था जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी और चंद्रशेखर आजाद के बीच काफी करीबी रिश्ते थे। खतौली विधानसभा उपचुनाव के दौरान अखिलेश, जयंत और चंद्रशेखर तीनों नेता एक साथ एक ही मंच पर हाथ उठाए नजर आए थे, जिसे विपक्ष की एकजुटता का बड़ा प्रतीक माना गया था।

अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को पूरा राजनीतिक बैकअप दिया था:

  • साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने अपने कोटे से रालोद को सम्मानजनक सीटें दीं और जयंत की राजनीतिक जमीन मजबूत की।
  • विधायकों की संख्या पर्याप्त न होने के बावजूद अखिलेश ने बड़े दिल का प्रदर्शन करते हुए जयंत चौधरी को अपने समर्थन से राज्यसभा भेजा।

लेकिन 2024 के आम चुनाव से ठीक पहले जयंत चौधरी अचानक पाला बदलकर भाजपा (NDA) के साथ चले गए। अखिलेश यादव के लिए यह एक बड़ा व्यक्तिगत और राजनीतिक झटका था। उन्हें लगा कि जिस नेता को उन्होंने हर मोड़ पर आगे बढ़ाया और ताकत दी, उसने वक्त आने पर साथ छोड़ दिया। इसी ‘धोखे’ ने अखिलेश को भविष्य के गठबंधनों के प्रति बेहद सतर्क बना दिया है।

चंद्रशेखर को ज्यादा स्पेस देने से क्यों हिचक रहे हैं अखिलेश?

जयंत चौधरी के साथ हुए अनुभव के बाद अखिलेश यादव अब चंद्रशेखर आजाद को बहुत ज्यादा प्रमोट करने या उन्हें किंगमेकर की भूमिका में लाने से बच रहे हैं। इसके पीछे सपा की एक सोची-समझी रणनीति और डर है:

  • भविष्य की चुनौती का डर: अखिलेश यादव को यह अंदेशा है कि अगर उन्होंने चंद्रशेखर को अपने साथ मिलाकर बहुत मजबूत किया और 2027 के चुनाव में चंद्रशेखर के कोर दलित वोट बैंक के सहारे उनके 10-12 विधायक जीतकर आ गए, तो भविष्य में चंद्रशेखर खुद समाजवादी पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश (विशेषकर पश्चिमी यूपी) में एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकते हैं।
  • रणनीति में बड़ा बदलाव: यही वजह है कि समाजवादी पार्टी ने अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी पुरानी लीक बदल दी है। सपा अब वहां केवल जाट या किसी एक विशेष दलित नेता के भरोसे रहने के बजाय गैर-जाट अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) और अति-पिछड़ों को अपने पाले में लाने पर ज्यादा फोकस कर रही है, जिसे सपा का नया ‘PDA’ समीकरण भी कहा जा रहा है।

चंद्रशेखर के पास खोने को कुछ नहीं, अखिलेश पर सत्ता का दबाव

इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य में दोनों नेताओं की स्थिति एकदम अलग है। पत्रकार आस मोहम्मद कैफ के विश्लेषण के अनुसार:

नेताराजनीतिक स्थिति और दृष्टिकोण
चंद्रशेखर आजादवे वर्तमान में दो रास्तों पर विचार कर रहे हैं—या तो अकेले दम पर अपनी जमीन मजबूत करें या सपा के साथ सम्मानजनक सीटों पर लड़ें। उनके पास खोने के लिए कुछ खास नहीं है, इसलिए वे राजनीति में बहुत बेबाकी और खुलकर रिस्क ले रहे हैं।
अखिलेश यादववे यूपी में मुख्य विपक्ष और भावी सत्ता के सबसे बड़े दावेदार हैं। उनके कंधे पर पार्टी को दोबारा सत्ता में वापस लाने का भारी दबाव है। इसलिए उन्हें हर कदम पर छोटे दलों के साथ नफा-नुकसान को बहुत बारीकी से तौलना पड़ रहा है।

2027 के रण से पहले उत्तर प्रदेश की इस बिसात पर यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चंद्रशेखर और अखिलेश के बीच अविश्वास की यह खाई कभी पट पाएगी, या फिर आगामी विधानसभा चुनाव में नए सियासी मोर्चे देखने को मिलेंगे।

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