US-China ‘G2’ Alliance: दोस्ती के नाम पर धोखा? क्या ट्रंप का नया महा-गठबंधन भारत के लिए खतरे की घंटी है

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नई दिल्ली : वैश्विक राजनीति के मंच से एक ऐसी खबर आ रही है जो आने वाले दिनों में दुनिया का नक्शा और ताकत का संतुलन दोनों बदल सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने पुराने ढर्रे पर लौटते दिख रहे हैं, जहां वे चीन के साथ एक खास रणनीतिक और व्यापारिक समझौता करने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की भाषा में ‘G2’ यानी अमेरिका और चीन का एक नया सुपर-पावर अलायंस कहा जा रहा है।

राष्ट्रपति ट्रंप कई बार शी जिनपिंग की तारीफ करते भी दिखे हैं. (Photo- ITG)

यह खबर भारत के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि नई दिल्ली पिछले कुछ सालों से अमेरिका को अपना सबसे भरोसेमंद वैश्विक जोड़ीदार मानकर चल रही थी। इंडो-पैसिफिक यानी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे को रोकने के लिए भारत और अमेरिका ने मिलकर जिस ‘क्वाड’ (QUAD) गठबंधन को मजबूत किया था, ट्रंप के इस नए रुख के बाद अब उस पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

क्या है ट्रंप का नया ‘G2’ प्लान और क्यों बढ़ा तनाव

डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति हमेशा से ‘अमेरिका फर्स्ट’ यानी अमेरिकी हितों को सर्वोपरि रखने की रही है। वाशिंगटन के रणनीतिक गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन चीन के साथ जारी लंबे ट्रेड वॉर और भू-राजनीतिक तनाव को एक बिजनेस डील की तरह सुलझाना चाहता है। इस नए ‘G2’ फॉर्मूले के तहत दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आपस में हाथ मिलाकर वैश्विक बाजार और सुरक्षा तंत्र को अपने हिसाब से नियंत्रित करने की कोशिश कर सकती हैं।

अगर अमेरिका और चीन के बीच यह नया समीकरण बनता है, तो एशिया में चीन को घेरने की भारत की रणनीतियों को गहरा धक्का लगेगा। भारत हमेशा से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक स्वतंत्र और खुला माहौल चाहता है, लेकिन अगर अमेरिका ही बीजिंग के साथ पर्दे के पीछे समझौता कर लेता है, तो इस पूरे इलाके में चीन को मनमानी करने की खुली छूट मिल जाएगी।

मैप विवाद और पाकिस्तान के बदले सुर ने बढ़ाई चिंता

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और हैरान करने वाली बात सामने आई है जिसने भारतीय नीति-निर्माताओं के कान खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय और कुछ प्रमुख थिंक-टैंक की बैठकों में एक बार फिर से दक्षिण एशिया के उन विवादित नक्शों का इस्तेमाल देखा गया है, जिसे लेकर भारत हमेशा से सख्त आपत्ति जताता रहा है। अमेरिकी अधिकारियों की तरफ से पाकिस्तान और चीन के दावों को अनजाने में या जानबूझकर शह देने वाले ये नक्शे भारत की संप्रभुता के लिहाज से एक बड़ी चिंता का विषय बन चुके हैं।

इधर वाशिंगटन में चीन के साथ सुर मिलाए जा रहे हैं, उधर इस्लामाबाद में भी अचानक हलचल तेज हो गई है। पाकिस्तान के हुक्मरान जो अब तक अमेरिकी अनदेखी से परेशान थे, वे अचानक ट्रंप के बयानों का स्वागत करने लगे हैं। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि अमेरिका और चीन एक मंच पर आते हैं, तो पाकिस्तान इसका फायदा उठाकर भारत के खिलाफ अपनी पुरानी साजिशों को दोबारा हवा देने की कोशिश करेगा।

क्वाड और भारत-अमेरिका दोस्ती का क्या होगा भविष्य

भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि भारत-अमेरिका की दोस्ती इक्कीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारी है। रक्षा सौदों से लेकर क्रिटिकल टेक्नोलॉजी (iCET) के ट्रांसफर तक, दोनों देशों ने काफी प्रगति की है। लेकिन ट्रंप का अचानक चीन के प्रति यह नरम रुख दिखाता है कि अमेरिका अपने आर्थिक फायदों के लिए किसी भी वक्त अपनी प्राथमिकताओं को बदल सकता है।

इस संभावित बदलाव के बाद सबसे बड़ा सवाल भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के संगठन ‘क्वाड’ के वजूद पर खड़ा हो गया है। क्वाड का मुख्य उद्देश्य ही चीन की आक्रामकता पर लगाम लगाना था। अगर ट्रंप बीजिंग के साथ मिलकर एक नई वैश्विक व्यवस्था की नींव रखते हैं, तो क्वाड का पूरा महत्व कागजों तक ही सीमित रह जाएगा, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद नुकसानदेह साबित होगा।

भारत के पास अब क्या हैं कूटनीतिक विकल्प

ऐसी स्थिति में जब वाशिंगटन पर पूरी तरह भरोसा करना मुश्किल होता जा रहा है, भारत को अपनी विदेश नीति में बड़े बदलाव करने होंगे। भारत सरकार अब केवल पश्चिमी देशों पर निर्भर रहने के बजाय ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील देशों के नेतृत्व को और मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर सकती है। इसके साथ ही, रूस के साथ अपनी पुरानी और परखी हुई दोस्ती को नया आयाम देना भी भारत की मजबूरी और जरूरत दोनों बन जाएगा।

बदलते वैश्विक परिवेश में भारत को अब अपनी सैन्य और आर्थिक आत्मनिर्भरता को और तेज गति से बढ़ाना होगा। आत्मनिर्भर भारत अभियान और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण की रफ्तार को दोगुना करना होगा ताकि आने वाले समय में अगर महाशक्तियां अपने फायदे के लिए पाला बदलती हैं, तो भी देश की सीमाओं और राष्ट्रीय हितों पर आंच न आए। ट्रंप का यह ‘G2’ दांव भारत के लिए एक कड़ा सबक है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता, यहाँ केवल स्थाई हित होते हैं।

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