Wed. Jun 3rd, 2026
    Congress MP Rahul Gandhi turns up heat on government over CBSE digital evaluation row

    Bharatnews / नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की कक्षा 12 की उत्तर पुस्तिकाओं के डिजिटल मूल्यांकन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और शैक्षणिक बहस का विषय बन गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सीबीएसई तथा उसकी तकनीकी साझेदार कंपनी पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को पेशेवर स्कैनरों के बजाय मोबाइल फोन से स्कैन किया गया। उनके अनुसार यह केवल तकनीकी लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया में संभावित अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी का संकेत है।

    राहुल गांधी के आरोपों ने उस विवाद को और गहरा कर दिया है, जो पिछले कुछ सप्ताह से छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। यह मामला अब केवल कम अंक आने या उत्तर पुस्तिकाओं में त्रुटियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी टेंडर प्रक्रिया, डेटा सुरक्षा, तकनीकी क्षमता और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

    डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली से शुरू हुआ विवाद

    सीबीएसई ने वर्ष 2026 में पहली बार पूरे देश में कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं के मूल्यांकन के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली लागू की। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य पारंपरिक मूल्यांकन प्रणाली को आधुनिक तकनीक से जोड़ना था।

    इस प्रणाली के तहत उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर डिजिटल रूप में परिवर्तित किया गया और फिर परीक्षकों को ऑनलाइन उपलब्ध कराया गया। बोर्ड का दावा था कि इससे मूल्यांकन की प्रक्रिया तेज होगी, मानवीय त्रुटियां कम होंगी और पारदर्शिता बढ़ेगी। साथ ही, उत्तर पुस्तिकाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने में लगने वाला समय और लागत भी कम होगी।

    शुरुआत में इस पहल को शिक्षा क्षेत्र में तकनीकी सुधार के रूप में देखा गया। लेकिन परिणाम घोषित होने के कुछ ही दिनों बाद छात्रों की शिकायतों ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।

    परिणाम आने के बाद बढ़ीं शिकायतें

    कक्षा 12 के परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में छात्रों ने अपनी समस्याएं साझा करनी शुरू कर दीं।

    कई छात्रों का आरोप था कि उन्हें अपेक्षा से बहुत कम अंक मिले हैं। विशेष रूप से भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित जैसे विषयों में कम अंक मिलने की शिकायतें सामने आईं।

    इसके साथ ही उत्तर पुस्तिकाओं की डिजिटल प्रतियों में कई तकनीकी समस्याएं भी दिखाई दीं। छात्रों ने दावा किया कि कुछ कॉपियों में पन्ने गायब थे, कुछ उत्तर धुंधले दिखाई दे रहे थे, जबकि कई जगह मूल्यांकन अधूरा प्रतीत हो रहा था।

    शुरुआत में इन शिकायतों को सामान्य तकनीकी त्रुटियां माना गया, लेकिन जैसे-जैसे मामलों की संख्या बढ़ती गई, विवाद भी गहराता गया।

    राहुल गांधी ने लगाए गंभीर आरोप

    राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक विस्तृत पोस्ट के माध्यम से इस मामले को राजनीतिक मुद्दा बना दिया।

    उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीएसई और उसकी निजी तकनीकी साझेदार कंपनी COEMPT Edu Teck ने उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं की हैं।

    राहुल गांधी के अनुसार मई 2025 में जारी मूल टेंडर में उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन करने के लिए सख्त तकनीकी मानक निर्धारित किए गए थे। इनमें ऑटोमैटिक रोबोटिक स्कैनरों का उपयोग, उत्तर पुस्तिका की बाइंडिंग को सुरक्षित रखना तथा न्यूनतम 300 DPI (डॉट्स पर इंच) रिजॉल्यूशन पर स्कैनिंग जैसी शर्तें शामिल थीं।

    लेकिन अगस्त 2025 में जब टेंडर दोबारा जारी किया गया, तब इन महत्वपूर्ण शर्तों को कथित रूप से हटा दिया गया या कमजोर कर दिया गया।

    राहुल गांधी ने कहा कि यह बदलाव सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे, बल्कि किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए किए गए प्रतीत होते हैं।

    उन्होंने आरोप लगाया कि स्कैनिंग मानकों को कमजोर करने के कारण उत्तर पुस्तिकाओं को पेशेवर स्कैनरों के बजाय मोबाइल फोन से स्कैन किया गया।

    “यह तकनीकी गलती नहीं, धोखाधड़ी है”

    राहुल गांधी ने अपने बयान में कहा कि छात्रों को जो धुंधली कॉपियां, गायब पन्ने और अधूरी उत्तर पुस्तिकाएं दिखाई दीं, वे महज तकनीकी त्रुटियां नहीं हैं।

    उनके अनुसार यह उन शर्तों का सीधा परिणाम है जिन्हें टेंडर प्रक्रिया के दौरान बदल दिया गया।

    उन्होंने कहा कि यदि उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग वास्तव में मोबाइल फोन से की गई है, तो यह पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

    कांग्रेस नेता ने इसे “धोखाधड़ी” करार देते हुए कहा कि जिन छात्रों के अंक प्रभावित हुए हैं, वे इस व्यवस्था की विफलता के शिकार बने हैं।

    सरकार पर भी साधा निशाना

    राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को भी घेरा।

    उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर निशाना साधते हुए कहा कि लाखों छात्रों की चिंता के बावजूद सरकार चुप्पी साधे हुए है।

    उन्होंने कहा कि देश के 18.5 लाख से अधिक छात्रों के भविष्य से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर सरकार को जवाब देना चाहिए।

    राहुल गांधी ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए कहा कि जवाबदेही केवल निजी कंपनियों की नहीं बल्कि उन अधिकारियों और नीति-निर्माताओं की भी होनी चाहिए जिन्होंने इस परियोजना की निगरानी की।

    छात्र शोधकर्ताओं ने उठाए अहम सवाल

    इस विवाद की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसके कई महत्वपूर्ण पहलू छात्रों और युवा शोधकर्ताओं द्वारा सामने लाए गए।

    छात्र शोधकर्ता सार्थक सिद्धांत ने सीबीएसई के टेंडर दस्तावेजों का अध्ययन कर मूल और संशोधित टेंडर के बीच अंतर को उजागर किया।

    उनके अनुसार कई तकनीकी और सुरक्षा मानकों को बाद में कमजोर किया गया।

    सार्थक की जांच को व्यापक समर्थन तब मिला जब बड़ी संख्या में छात्रों ने उत्तर पुस्तिकाओं में गड़बड़ियों की शिकायतें शुरू कर दीं।

    मोबाइल फोन से स्कैनिंग के आरोप क्यों लगे?

    विवाद का सबसे चर्चित हिस्सा उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग तकनीक को लेकर है।

    सार्थक सिद्धांत ने सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कुछ उत्तर पुस्तिकाओं की डिजिटल प्रतियों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि कई दस्तावेजों में ड्रॉप शैडो (Drop Shadow) और मोड़ के स्पष्ट निशान दिखाई दे रहे थे।

    तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार ड्रॉप शैडो आमतौर पर तब दिखाई देती है जब किसी दस्तावेज की तस्वीर मोबाइल फोन या कैमरे से ली जाती है। दूसरी ओर पेशेवर स्कैनर सामान्यतः एक समान और छाया-रहित छवि तैयार करते हैं।

    सार्थक ने सवाल उठाया कि यदि उत्तर पुस्तिकाएं उच्च गुणवत्ता वाले स्कैनरों से स्कैन की गई थीं, तो उनमें मोबाइल कैमरे जैसी विशेषताएं क्यों दिखाई दे रही हैं।

    हालांकि अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया गया है जिससे यह निश्चित रूप से साबित हो सके कि मोबाइल फोन का उपयोग किया गया था। लेकिन इन आरोपों ने स्वतंत्र जांच की मांग को और मजबूत कर दिया है।

    साइबर सुरक्षा को लेकर भी चिंता

    इस विवाद को और गंभीर बनाने का काम किया युवा एथिकल हैकर निसर्ग अधिकारी ने।

    उन्होंने दावा किया कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली से जुड़े पोर्टलों में गंभीर सुरक्षा खामियां मौजूद थीं।

    निसर्ग ने कुछ स्क्रीनशॉट साझा करते हुए कहा कि सिस्टम में ऐसी कमजोरियां थीं जिनका फायदा उठाकर कोई भी व्यक्ति उत्तर पुस्तिकाओं तक पहुंच सकता था।

    यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह केवल मूल्यांकन प्रक्रिया का मुद्दा नहीं रहेगा बल्कि लाखों छात्रों की निजी जानकारी की सुरक्षा का मामला बन जाएगा।

    सीबीएसई ने मानी कुछ कमजोरियां

    शुरुआत में सीबीएसई ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था। लेकिन बाद में बोर्ड ने स्वीकार किया कि एक संबद्ध पोर्टल में कुछ सुरक्षा संबंधी कमजोरियां पाई गई थीं।

    बोर्ड ने कहा कि साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों, सरकारी तकनीकी एजेंसियों और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) के विशेषज्ञों की मदद से सुरक्षा प्रणाली को मजबूत किया जा रहा है।

    सीबीएसई का कहना है कि स्थिति को नियंत्रित करने और भविष्य में ऐसी समस्याओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

    उत्तर पुस्तिकाओं की अदला-बदली ने बढ़ाई चिंता

    विवाद तब और बढ़ गया जब दिल्ली के एक छात्र ने दावा किया कि उसके रोल नंबर पर अपलोड की गई उत्तर पुस्तिका किसी दूसरे छात्र की थी। बाद में सीबीएसई ने गलती स्वीकार करते हुए सही उत्तर पुस्तिका उपलब्ध कराई।

    हालांकि इस घटना के बाद कई अन्य छात्रों ने भी ऐसी ही शिकायतें दर्ज कराईं। कुछ छात्रों ने कहा कि अपलोड की गई कॉपियां उनकी लिखावट या उत्तर देने की शैली से मेल नहीं खाती थीं। इन घटनाओं ने छात्रों और अभिभावकों के बीच अविश्वास को और बढ़ा दिया।

    जब छात्रों ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करना शुरू किया, तब एक और समस्या सामने आई। अत्यधिक ट्रैफिक के कारण सीबीएसई का री-इवैल्यूएशन पोर्टल बार-बार क्रैश होने लगा। कई छात्र समय पर आवेदन नहीं कर पाए।

    स्थिति को देखते हुए बोर्ड को आवेदन की समय-सीमा बढ़ानी पड़ी और कई स्पष्टीकरण जारी करने पड़े। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि डिजिटल प्रणाली को पर्याप्त तैयारी के बिना लागू किया गया।

    सीबीएसई के सामने भरोसे का संकट

    यह विवाद अब केवल तकनीकी खामियों का मामला नहीं रह गया है। देशभर के लाखों छात्रों और अभिभावकों के लिए बोर्ड परीक्षाएं उनके भविष्य का आधार होती हैं। ऐसे में यदि मूल्यांकन प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो उसका असर पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ता है।

    शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल तकनीक का उपयोग आवश्यक है, लेकिन उसे लागू करने से पहले व्यापक परीक्षण, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और पारदर्शी निगरानी तंत्र सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

    राहुल गांधी के आरोपों के बाद इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग तेज हो गई है। छात्र संगठन, अभिभावक समूह और विपक्षी दल चाहते हैं कि टेंडर प्रक्रिया, स्कैनिंग तकनीक, साइबर सुरक्षा और मूल्यांकन प्रणाली की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

    सीबीएसई के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती छात्रों और अभिभावकों का विश्वास दोबारा हासिल करने की है।

    फिलहाल यह विवाद केवल उत्तर पुस्तिकाओं तक सीमित नहीं है। यह पारदर्शिता, जवाबदेही और भारत की शिक्षा व्यवस्था में भरोसे की परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में जांच और आधिकारिक प्रतिक्रियाएं तय करेंगी कि यह मामला केवल तकनीकी लापरवाही साबित होता है या देश की शिक्षा प्रणाली से जुड़े सबसे बड़े विवादों में से एक के रूप में दर्ज होता है।

    By ABHI KK

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