कानपुर से यूके तक जाल: 13 साल से चल रही थी फर्जी डिग्री की इंटरनेशनल ‘फैक्ट्री’, फिशिंग से देते थे बैकग्राउंड वेरिफिकेशन

कानपुर पुलिस की गिरफ्त में फ्रॉड गैंग (Photo- Screengrab)

कानपुर : उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की पुलिस और क्राइम ब्रांच ने एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट (अंतरराष्ट्रीय गिरोह) का भंडाफोड़ किया है, जिसके कारनामे सुनकर देश-विदेश की सुरक्षा और शिक्षा एजेंसियां दंग रह गई हैं। कानपुर पुलिस ने पिछले 13 वर्षों से देश के कई राज्यों सहित यूनाइटेड किंगडम (UK) और यूनाइटेड स्टेट्स (US) तक फैले एक फर्जी डिग्री रैकेट का पर्दाफाश किया है। यह गिरोह न सिर्फ देश-विदेश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज की हूबहू जाली डिग्रियां और मार्कशीट छापता था, बल्कि कॉर्पोरेट कंपनियों को ठगने के लिए ‘फिशिंग’ (Phishing) तकनीक का इस्तेमाल कर फर्जी बैकग्राउंड वेरिफिकेशन (Background Verification) भी पास करा देता था।

पुलिस ने इस धंधे के मास्टरमाइंड को भारी मात्रा में हाईटेक प्रिंटर्स, हूबहू दिखने वाले जाली होलोग्राम और जाली दस्तावेजों के साथ गिरफ्तार कर लिया है।

13 साल से देश-विदेश में चल रहा था ‘डिग्री का काला बाजार’

पुलिस की शुरुआती तफ्तीश में सामने आया है कि यह इंटरनेशनल सिंडिकेट साल 2013 से लगातार सक्रिय था। कानपुर को अपना मुख्य गढ़ बनाकर इस गिरोह ने भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों में भी अपना नेटवर्क फैला रखा था। जिन युवाओं को विदेश में नौकरी या पढ़ाई के लिए जाना होता था या जो भारत की बड़ी आईटी (IT) और कॉर्पोरेट कंपनियों में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाना चाहते थे, वे इस गिरोह के मुख्य ग्राहक होते थे।

पकड़े गए आरोपियों के पास से भारत की नामचीन यूनिवर्सिटीज के अलावा यूके और यूएस की कई शीर्ष शिक्षण संस्थाओं के नाम की डिग्रियां, डिप्लोमा सर्टिफिकेट और माइग्रेशन सर्टिफिकेट बरामद हुए हैं। आरोपी इतने शातिर थे कि वे मूल डिग्री में इस्तेमाल होने वाले विशेष कागज, स्याही और सुरक्षा धागों (Security Threads) का ही इस्तेमाल करते थे, जिससे पहली नजर में असली और नकली में फर्क करना नामुमकिन हो जाता था।

फिशिंग का खेल: ऐसे चकमा देते थे कॉर्पोरेट कंपनियों को

इस गिरोह की सबसे हैरान करने वाली कार्यप्रणाली उनका ‘बैकग्राउंड वेरिफिकेशन बाईपास’ मॉडल था। आज के समय में कोई भी बड़ी कंपनी नौकरी देने से पहले कर्मचारी की डिग्री का वेरिफिकेशन यूनिवर्सिटी से करवाती है। इस चुनौती से निपटने के लिए आरोपियों ने डिजिटल धोखाधड़ी का सहारा लिया।

  • फर्जी वेबसाइट्स (Phishing): आरोपियों ने नामचीन यूनिवर्सिटीज और वेरिफिकेशन एजेंसियों की हूबहू दिखने वाली फर्जी वेबसाइट्स (क्लोन वेबसाइट्स) बना रखी थीं, जिनके डोमेन नेम (Domain Names) असली वेबसाइट्स से महज एक-आध अक्षर के अंतर पर थे।
  • फर्जी ईमेल और सर्वर: जब कोई कंपनी बैकग्राउंड वेरिफिकेशन के लिए यूनिवर्सिटी को आधिकारिक ईमेल भेजती थी, तो यह गिरोह बीच में ही तकनीक के जरिए उस ईमेल को अपनी फिशिंग वेबसाइट और ईमेल सर्वर पर डाइवर्ट (मोड़) कर लेता था।
  • ‘ऑल क्लियर’ की रिपोर्ट: इसके बाद आरोपी खुद ही यूनिवर्सिटी का प्रशासनिक अधिकारी बनकर कंपनी को ‘सक्सेसफुल वेरिफिकेशन’ (Verification Approved) का ईमेल भेज देते थे। इस तरह कंपनियां झांसे में आ जाती थीं और फर्जी डिग्री धारकों को नौकरी मिल जाती थी।

पुलिस रेड: होलोग्राम, प्रिंटर और डेटाबेस बरामद

कानपुर पुलिस और साइबर सेल की संयुक्त टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर सिंडिकेट के ठिकाने पर छापेमारी की। इस कार्रवाई के दौरान पुलिस को भारी मात्रा में आपत्तिजनक सामग्रियां मिली हैं:

  1. होलोग्राम और सील: विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के हजारों जाली होलोग्राम और रबर स्टैम्प (सील)।
  2. हाईटेक मशीनरी: डिग्रियों पर सोने और चांदी के अक्षरों की छपाई करने वाले अत्याधुनिक प्रिंटर्स, कटर और लैमिनेटर मशीनें।
  3. डेटाबेस: आरोपियों के लैपटॉप और हार्ड डिस्क से हजारों ऐसे लोगों का डेटा मिला है, जिन्होंने पिछले 13 सालों में इनसे फर्जी डिग्रियां खरीदीं और वर्तमान में देश-विदेश में ऊंची नौकरियों पर तैनात हैं।

पुलिस कमिश्नर का बयान और आगे की जांच

कानपुर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने मामले की जानकारी देते हुए बताया:

“यह केवल एक साधारण जालसाजी का मामला नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक संगठित साइबर और बौद्धिक अपराध (Intellectual Crime) है। मास्टरमाइंड को गिरफ्तार कर लिया गया है और उससे पूछताछ जारी है। इस गिरोह के तार यूके और यूएस की कुछ संदिग्ध कंसल्टेंसी फर्म्स से भी जुड़े हुए हैं। हम केंद्रीय जांच एजेंसियों और साइबर एक्सपर्ट्स की मदद से उन सभी लोगों की सूची तैयार कर रहे हैं, जिन्होंने इन फर्जी डिग्रियों का इस्तेमाल कर विदेशों में वीजा या नौकरियां हासिल की हैं।”

इस बड़े खुलासे के बाद अब उन हजारों लोगों की धड़कनें बढ़ गई हैं जिन्होंने इस सिंडिकेट से डिग्रियां खरीदी थीं। पुलिस का कहना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में कई और बड़ी गिरफ्तारियां हो सकती हैं और फर्जी तरीके से नौकरी पाने वाले कई सफेदपोशों के चेहरे से नकाब उतरना तय है।

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