केरल में बीजेपी ने अपनी रणनीति बदली है और हिंदू पिछड़ों पर फोकस करने का फैसला किया है. (Photo: PTI)

BHARATNEWS / केरल की राजनीति लंबे समय से दो बड़े गठबंधनों — एलडीएफ (LDF) और यूडीएफ (UDF) — के बीच घूमती रही है। लेकिन हालिया विधानसभा चुनाव में तीन सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद भारतीय जनता पार्टी अब राज्य की राजनीति में खुद को एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। इसी दिशा में पार्टी ने आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए एक नया 13 सूत्रीय राजनीतिक एजेंडा तैयार किया है, जिसने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।

बीजेपी का यह नया एजेंडा केवल चुनावी रणनीति नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राज्य में पार्टी की लंबी राजनीतिक पारी की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। खास बात यह है कि पार्टी ने इस बार अपना फोकस हिंदू पिछड़े वर्गों, OBC समुदाय और सामाजिक मुद्दों पर ज्यादा रखा है। साथ ही अल्पसंख्यक राजनीति को लेकर भी पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव के संकेत दिए हैं।

तीन सीटों की जीत ने बढ़ाया बीजेपी का आत्मविश्वास

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को तीन सीटों पर जीत मिली। भले ही यह संख्या बहुत बड़ी न हो, लेकिन केरल जैसे राज्य में जहां बीजेपी लंबे समय तक राजनीतिक रूप से हाशिये पर रही, वहां यह जीत पार्टी के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक संदेश लेकर आई है।

बीजेपी नेतृत्व का मानना है कि राज्य में अब धीरे-धीरे राजनीतिक माहौल बदल रहा है और लोग पारंपरिक एलडीएफ-यूडीएफ राजनीति से अलग विकल्प तलाश रहे हैं। यही वजह है कि पार्टी अब आक्रामक तरीके से संगठन विस्तार और सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में जुट गई है।

OBC वोट बैंक पर बीजेपी की खास नजर

13 सूत्रीय एजेंडे में सबसे ज्यादा चर्चा OBC समुदाय को लेकर बनाई गई रणनीति की हो रही है। बीजेपी ने साफ कहा है कि OBC आरक्षण को “धर्म आधारित आरक्षण” में नहीं बदला जाना चाहिए। पार्टी का आरोप है कि कुछ अल्पसंख्यक समुदाय OBC कोटे का लाभ उठा रहे हैं, जिससे वास्तविक पिछड़े वर्गों को नुकसान हो रहा है।

बीजेपी अब राज्य में हिंदू पिछड़े वर्गों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेताओं का मानना है कि अगर OBC समुदाय को संगठित तरीके से अपने साथ लाया जाए तो केरल की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, उत्तर भारत में बीजेपी की सफलता का बड़ा आधार OBC राजनीति रही है और अब पार्टी उसी मॉडल को दक्षिण भारत, खासकर केरल में लागू करने की कोशिश कर रही है।

अल्पसंख्यक रणनीति में बदलाव के संकेत

बीजेपी की राजनीति में एक बड़ा बदलाव यह भी देखने को मिला है कि पार्टी ने इस बार चर्च नेतृत्व के साथ बड़े स्तर पर राजनीतिक संपर्क बढ़ाने की रणनीति को थोड़ा पीछे रखा है। पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी ने केरल के क्रिश्चियन समुदाय तक पहुंच बनाने के लिए कई प्रयास किए थे, लेकिन अब पार्टी अपना ज्यादा फोकस हिंदू और OBC वोट बैंक पर कर रही है।

हालांकि पार्टी ने यह भी साफ किया है कि वह क्रिश्चियन समुदाय से दूरी नहीं बना रही, बल्कि अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को नए तरीके से तय कर रही है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि पार्टी “सबका साथ, सबका विकास” की नीति पर काम कर रही है और किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है।

इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी अब पहचान आधारित राजनीति और सामाजिक ध्रुवीकरण के जरिए अपने कोर वोट बैंक को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

“तुष्टिकरण की राजनीति” पर हमला

बीजेपी ने अपने एजेंडे में “किसी का तुष्टिकरण नहीं” की लाइन को प्रमुखता से रखा है। पार्टी ने मुस्लिम लीग और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों पर भी निशाना साधा और आरोप लगाया कि राज्य की पारंपरिक पार्टियां वोट बैंक की राजनीति कर रही हैं।

बीजेपी का दावा है कि एलडीएफ और यूडीएफ दोनों ने लंबे समय तक अल्पसंख्यक वोटों के लिए राजनीति की, जबकि हिंदू पिछड़े वर्गों की समस्याओं को नजरअंदाज किया गया। पार्टी अब इसी मुद्दे को जनता के बीच लेकर जाने की तैयारी कर रही है।

सबरीमला मुद्दे को फिर बनाया बड़ा हथियार

बीजेपी ने अपने नए एजेंडे में सबरीमला मंदिर मुद्दे को भी प्रमुखता दी है। पार्टी ने सबरीमला गोल्ड केस की CBI जांच की मांग दोहराई है। साथ ही आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने की भी मांग की गई है।

सबरीमला मुद्दा पहले भी केरल की राजनीति में बड़ा चुनावी विषय बन चुका है। बीजेपी का मानना है कि इस मुद्दे के जरिए वह राज्य के हिंदू मतदाताओं को भावनात्मक रूप से जोड़ सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों को लगातार जीवित रखकर राज्य में अपनी वैचारिक जमीन मजबूत करना चाहती है।

क्या केरल में तीसरा विकल्प बन पाएगी बीजेपी?

बीजेपी अब लगातार यह दावा कर रही है कि केरल में NDA एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में उभर रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि राज्य की जनता अब एलडीएफ और यूडीएफ दोनों से निराश हो चुकी है और नए राजनीतिक विकल्प की तलाश कर रही है।

हालांकि राजनीतिक वास्तविकता अभी भी बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। केरल में पार्टी का वोट प्रतिशत अभी सीमित है और संगठनात्मक स्तर पर भी उसे काफी मेहनत करनी होगी। लेकिन पार्टी की हालिया सक्रियता और नए एजेंडे से साफ है कि बीजेपी अब केरल को लेकर गंभीर राजनीतिक योजना बना रही है।

दक्षिण भारत में विस्तार की बड़ी रणनीति

केरल में बीजेपी का यह नया अभियान केवल राज्य तक सीमित नहीं माना जा रहा। दरअसल, पार्टी दक्षिण भारत में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए लगातार नए प्रयोग कर रही है। कर्नाटक और तेलंगाना के बाद अब केरल पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

बीजेपी नेतृत्व समझता है कि राष्ट्रीय राजनीति में लंबे समय तक मजबूत बने रहने के लिए दक्षिण भारत में विस्तार बेहद जरूरी है। यही कारण है कि पार्टी सामाजिक समीकरण, धार्मिक मुद्दों और क्षेत्रीय राजनीति को ध्यान में रखकर अलग-अलग रणनीतियां तैयार कर रही है।

विपक्ष ने साधा निशाना

बीजेपी के नए एजेंडे पर विपक्षी दलों ने भी हमला बोला है। कांग्रेस और वाम दलों का आरोप है कि बीजेपी राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है। विपक्ष का कहना है कि बीजेपी विकास और रोजगार जैसे मुद्दों से ध्यान हटाकर पहचान आधारित राजनीति को बढ़ावा दे रही है।

वहीं बीजेपी इन आरोपों को खारिज करते हुए कह रही है कि वह केवल सामाजिक न्याय और समान अधिकारों की बात कर रही है।

आगामी लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी का यह नया एजेंडा केरल की राजनीति को और गर्माने वाला है। पार्टी अब गांव-गांव तक पहुंचकर OBC और हिंदू समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की तैयारी कर रही है।

हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी वास्तव में केरल में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर पाएगी या फिर यह रणनीति केवल सीमित चुनावी असर तक ही सिमट कर रह जाएगी। लेकिन इतना जरूर है कि राज्य की राजनीति अब नए मोड़ पर पहुंच चुकी है और आने वाले महीनों में मुकाबला और ज्यादा दिलचस्प होने वाला है।

By ABHI KK

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