
ऑपरेशन सिंदूर की कहानी सामने आने के साथ अब उस सैन्य अभियान से जुड़े कई ऐसे पहलू सामने आ रहे हैं, जिनसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत ने 7 मई 2025 की कार्रवाई को कितनी गोपनीयता के साथ अंजाम दिया था। डिस्कवरी की डॉक्यूमेंट्री ‘डीक्लासिफाइड: ऑपरेशन सिंदूर’ में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने उस रात की तैयारियों और ऑपरेशन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि ऑपरेशन की तारीख और सटीक समय की जानकारी आखिरी क्षण तक बेहद सीमित लोगों के पास थी। नॉर्दर्न कमांड के तत्कालीन GOC-in-C लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने बताया कि उन्हें फोन पर कभी यह नहीं कहा गया कि हमला किस दिन या किस समय किया जाना है। उनका कहना था कि भारतीय पक्ष का उद्देश्य हर हाल में दुश्मन को चौंकाना था।
प्रतीक शर्मा के मुताबिक, एक ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी को दिल्ली भेजा गया था। उनके पास चीफ की लिखी हुई एक चिट थी। निर्देश बिल्कुल स्पष्ट था—चिट को रास्ते में नहीं खोलना है, बल्कि सीधे आर्मी कमांडर को सौंपना है। इसके बाद संबंधित अधिकारी खुद उस संदेश को पढ़ते। प्रतीक शर्मा ने बताया कि उन्हें वास्तविक समय की जानकारी 6 मई को मिली और उन्होंने इसे भी बेहद सीमित दायरे में रखा।
14 दिनों तक चलती रही तैयारी
ऑपरेशन सिंदूर अचानक लिया गया फैसला नहीं था। पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत के सामने जवाब देने की चुनौती थी। इस हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इसके बाद सैन्य स्तर पर कार्रवाई की तैयारी शुरू हुई और करीब दो सप्ताह तक अलग-अलग स्तर पर तैयारियां चलती रहीं।
लेकिन तैयारी का मतलब यह नहीं था कि हर अधिकारी को हमले की तारीख मालूम थी। यही ऑपरेशन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी। सैन्य नेतृत्व ने जानकारी को आवश्यकता के अनुसार सीमित रखा, ताकि किसी भी स्तर पर संवेदनशील जानकारी लीक न हो।
तत्कालीन DGMO लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने डॉक्यूमेंट्री में बताया कि 6 मई की सुबह उन्हें स्पष्ट हो गया था कि उसी रात लक्ष्यों को निशाना बनाया जाना है। हमला रात 1 बजकर 5 मिनट पर करने का समय तय किया गया था। उनके अनुसार, रात का यह समय इसलिए चुना गया क्योंकि इससे सरप्राइज एलिमेंट अधिकतम रखा जा सकता था।
राजीव घई ने बताया कि जब स्ट्राइक का समय करीब आ रहा था, तब मिलिट्री ऑपरेशंस डायरेक्टोरेट के भीतर भी सभी लोगों को इसकी जानकारी नहीं थी। उनके मुताबिक उस समय केवल सीमित स्तर पर ही यह जानकारी थी कि वास्तविक कार्रवाई वाली रात आ चुकी है।
बड़े अधिकारी भी अलग-अलग रास्तों से पहुंचे
ऑपरेशन की गोपनीयता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने भी सामान्य गतिविधि से अलग तरीके अपनाए। राजीव घई ने बताया कि 6 मई की रात उनकी बेटी और दामाद अचानक घर आए थे। जब उन्हें पता चला कि वह ऑफिस जा रहे हैं तो उन्होंने उन्हें साउथ ब्लॉक तक छोड़ दिया।
आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भी बताया कि उन्होंने अपने सहायक से आधी रात से कुछ पहले निजी कार निकालने को कहा और घर के पिछले दरवाजे से निकल गए। ऐसा रास्ता उन्होंने सामान्य तौर पर इस्तेमाल नहीं किया था। मकसद यही था कि उनकी गतिविधि से किसी को कोई असामान्य संकेत न मिले।
वहीं एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने बताया कि उन्होंने पहले ही लोगों को बता दिया था कि वह शाम को दिल्ली से बाहर जा रहे हैं। सबको लगा कि वह बड़ौदा जा रहे हैं। वह एक विमान में बैठे, लेकिन विमान बड़ौदा नहीं गया। एक स्थानीय उड़ान के बाद वापस लैंड किया गया और किसी को यह जानकारी नहीं थी कि एयर चीफ वापस आ चुके हैं।
नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने भी बताया कि उन्होंने परिवार से कहा था कि उन्हें कुछ काम है और उनका इंतजार न किया जाए। इस तरह सैन्य नेतृत्व के अलग-अलग सदस्य अलग-अलग तरीकों से ऑपरेशन रूम तक पहुंचे।
ऑपरेशन रूम में बढ़ता गया तनाव
रात करीब 11:30 बजे तक तीनों सेनाओं के प्रमुख ऑपरेशन रूम में पहुंच चुके थे। वहां कई स्क्रीन पर लाइव फीड दिखाई जा रही थी। लक्ष्यों पर लगातार नजर रखी जा रही थी और हर अधिकारी का ध्यान ऑपरेशन की अंतिम तैयारी पर था।
कर्नल आशीष उप्रेती ने बताया कि उस समय उन्हें महसूस हुआ कि स्ट्राइक उसी रात होने वाली है। वातावरण बेहद शांत था और सभी अधिकारी स्क्रीन पर अपना ध्यान लगाए हुए थे।
राजीव घई ने उस समय के तनाव को याद करते हुए बताया कि किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले कई तरह के सवाल दिमाग में आते हैं। क्या हथियार सही लक्ष्य तक पहुंचेंगे? क्या लाइव फीड में कोई तकनीकी समस्या होगी? क्या पूरी योजना उसी तरह काम करेगी जैसी तय की गई है? लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, ऑपरेशन अपने निर्धारित चरण में पहुंचता गया।
रात 1:05 बजे शुरू हुई कार्रवाई
आखिरकार 7 मई 2025 की रात 1 बजकर 5 मिनट पर वह समय आया जिसका इंतजार किया जा रहा था। भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी ढांचे से जुड़े नौ ठिकानों को निशाना बनाया। इनमें बहावलपुर और मुरीदके जैसे महत्वपूर्ण ठिकाने शामिल थे।
ऑपरेशन सिंदूर को केवल एक सैन्य कार्रवाई के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इसे पहलगाम हमले के जवाब में भारत की आतंकवाद विरोधी नीति के एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में भी देखा गया। इस ऑपरेशन में लक्ष्य चयन, समय निर्धारण और गोपनीयता को विशेष महत्व दिया गया।
डॉक्यूमेंट्री में सामने आई जानकारियां यह बताती हैं कि ऑपरेशन की सफलता के पीछे केवल हथियारों और तकनीक की भूमिका नहीं थी, बल्कि जानकारी को नियंत्रित रखना और सही समय पर सही अधिकारी को सही सूचना देना भी उतना ही महत्वपूर्ण था।
लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा का यह बयान—कि उन्हें फोन पर भी हमले की तारीख नहीं बताई गई थी—पूरे ऑपरेशन की गोपनीयता को समझने के लिए काफी है। सैन्य अभियान में सरप्राइज का महत्व बहुत अधिक होता है और ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय पक्ष ने इसी सिद्धांत को बेहद सख्ती से लागू किया।
‘डीक्लासिफाइड: ऑपरेशन सिंदूर’ में सामने आई यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें ऑपरेशन से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के प्रत्यक्ष अनुभव शामिल हैं। डॉक्यूमेंट्री में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का ऑपरेशन के बाद विस्तृत इंटरव्यू भी शामिल है।
इस पूरी कहानी से एक बात साफ होती है कि 7 मई की रात हुई कार्रवाई के पीछे लंबे समय तक चली तैयारी, बेहद सीमित सूचना साझा करना, सटीक समय का चयन और अंतिम क्षण तक बरती गई गोपनीयता की अहम भूमिका थी। भारत ने जिस तरह से हमले की तारीख और समय को सीमित दायरे में रखा, उसका उद्देश्य स्पष्ट था—दुश्मन को आखिरी क्षण तक अनजान रखना और सरप्राइज का लाभ उठाना।
