एक हफ्ते बाद तिहाड़ जेल से रिहा हुए CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका, अदालत ने रखीं ये शर्तें

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CJP co-convenor Ashutosh Ranka after being released from Tihar Jail.

नई दिल्ली: कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 को तिहाड़ जेल से रिहा कर दिया गया। दोनों नेता दिल्ली के जंतर-मंतर पर 14 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ तिरंगा मार्च निकालने की कोशिश के बाद हिरासत में लिए गए थे। उनकी न्यायिक हिरासत की अवधि समाप्त होने के करीब पहुंचने पर विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) ने उनकी रिहाई का आदेश दिया।

दोनों नेताओं की रिहाई का आदेश उस समय आया, जब उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में हिरासत बढ़ाए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली अपनी याचिका वापस ले ली थी। अदालत ने रिहाई के दौरान दोनों से शांति बनाए रखने और कानून-व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करने का लिखित आश्वासन लिया। साथ ही, जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने को लेकर भी शर्तें निर्धारित की गईं।

50-50 हजार रुपये के निजी मुचलके और जमानतदार

विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष बुधवार को सौरव दास और आशुतोष रांका को पेश किया गया। सुनवाई के दौरान दोनों की ओर से जमानतदारों से संबंधित दस्तावेज जमा किए गए। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने उनकी रिहाई का आदेश दिया।

अदालत ने दोनों नेताओं को 50-50 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के जमानतदार प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। आदेश के मुताबिक, दोनों ने इस शर्त का पालन किया।

रिहाई के साथ दोनों नेताओं को यह भी निर्देश दिया गया कि वे प्रत्येक सुनवाई की तारीख पर अदालत में उपस्थित रहें। उन्हें अपने निजी मुचलकों और लिखित आश्वासनों में निर्धारित शर्तों का सख्ती से पालन करने के लिए कहा गया।

अदालत ने दोनों से लिखित में यह आश्वासन भी लिया कि वे शांति भंग करने वाला कोई काम नहीं करेंगे और कानून-व्यवस्था बनाए रखेंगे। इसके अलावा, उन्होंने यह भी भरोसा दिया कि कानून के अनुसार जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए दोबारा अधिसूचित किए जाने तक वहां प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में किए जाने वाले किसी भी विरोध प्रदर्शन को संवैधानिक दायरे में रखा जाएगा।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे नेता

सौरव दास और आशुतोष रांका मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। दोनों की मांग थी कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान कथित अनियमितताओं और मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें।

इसी मांग को लेकर 14 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर तिरंगा मार्च आयोजित करने की कोशिश की गई थी। इस दौरान दोनों नेताओं पर निर्धारित प्रतिबंधों का उल्लंघन कर जंतर-मंतर में प्रवेश करने का आरोप लगा। इसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया।

प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर को उस समय अधिसूचित नहीं किया गया था। अधिकारियों के मुताबिक, दोनों नेताओं ने पहले दिए गए शांति बनाए रखने के बांड की शर्तों का उल्लंघन किया था। इसी आधार पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई।

पहले पांच दिन की न्यायिक हिरासत, फिर दो दिन की बढ़ोतरी

सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिए जाने के बाद शुरुआत में पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। इसके बाद 19 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने उनकी हिरासत दो दिनों के लिए और बढ़ा दी थी।

हिरासत बढ़ाए जाने के फैसले को दोनों नेताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, बुधवार को सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने उनकी याचिका पर कुछ प्रक्रियागत और कानूनी पहलुओं को लेकर सवाल उठाए। इसके बाद दोनों ने अपनी याचिका वापस लेने का फैसला किया।

हाई कोर्ट से याचिका वापस लिए जाने के कुछ घंटे बाद ही विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दोनों की रिहाई का आदेश जारी कर दिया। इस तरह करीब एक सप्ताह तक हिरासत में रहने के बाद दोनों नेता जेल से बाहर आ गए।

दिल्ली हाई कोर्ट में क्या हुआ?

बुधवार को न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद की अदालत में दोनों नेताओं की याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि जब कानून में दूसरे कानूनी उपाय उपलब्ध हैं, तो उन उपायों को अपनाए बिना सीधे हाई कोर्ट का रुख क्यों किया गया।

न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि दोनों को पहले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष होने वाली कार्यवाही के परिणाम का इंतजार करना चाहिए और उसके बाद कानून के अनुसार आगे कदम उठाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान दोनों नेताओं के वकील अभिक चिमनी ने हिरासत बढ़ाने के 19 अक्टूबर के आदेश पर सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि आदेश में यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया था कि दोनों नेताओं से तत्काल खतरा किस तरह पैदा हो रहा था।

वकील ने जमानतदारों को बार-बार अस्वीकार किए जाने के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने दोनों नेताओं को निजी मुचलकों पर रिहा करने की मांग की।

इस पर हाई कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों की ओर ध्यान दिलाया। इसके बाद अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। हालांकि, अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की।

इसका अर्थ है कि हाई कोर्ट ने हिरासत बढ़ाने के फैसले को सही या गलत ठहराने वाला कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया। याचिका वापस लिए जाने के बाद रिहाई का आदेश विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कार्यवाही के तहत आया।

10 अक्टूबर को भी हिरासत में लिए गए थे दोनों नेता

सौरव दास और आशुतोष रांका को इससे पहले 10 अक्टूबर को भी हिरासत में लिया गया था। दोनों को दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उस समय रोका गया था, जब वे ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शनों से पहले मौजूद थे।

इसके बाद उनके खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 और 170 के तहत कार्रवाई की गई। दोनों को उसी दिन 50-50 हजार रुपये के शांति बनाए रखने के बांड प्रस्तुत करने के बाद रिहा कर दिया गया था।

हालांकि, चार दिन बाद 14 अक्टूबर को उन्हें फिर से हिरासत में ले लिया गया। अधिकारियों का आरोप था कि दोनों नेताओं ने तिरंगा मार्च के दौरान जंतर-मंतर में प्रवेश किया और पहले दिए गए शांति बांड की शर्तों का उल्लंघन किया।

19 अक्टूबर को हिरासत बढ़ाने के आदेश में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऋतु राज ने कहा था कि दोनों ने जानबूझकर बांड की शर्तों का उल्लंघन किया। मजिस्ट्रेट ने पहले जमा किए गए जमानत संबंधी दस्तावेजों में विसंगतियां पाए जाने और पूछताछ के दौरान संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के बाद नए जमानतदार प्रस्तुत करने को भी कहा था।

रिहाई के बाद CJP की प्रतिक्रिया

दोनों नेताओं की रिहाई पर कॉकroach जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने फिल्म ‘चक दे! इंडिया’ में शाहरुख खान के भावुक चेहरे वाले मीम को साझा किया।

सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई के बाद अब उनके सामने अदालत की ओर से तय की गई शर्तों का पालन करने की जिम्मेदारी होगी। उन्हें प्रत्येक सुनवाई पर उपस्थित रहना होगा और शांति बनाए रखने के अपने लिखित आश्वासन का पालन करना होगा।

इस पूरे मामले में मुख्य विवाद जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की अनुमति, शांति बांड की शर्तों और हिरासत बढ़ाने की कानूनी प्रक्रिया को लेकर रहा है। दोनों नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ SIR से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था, जबकि अधिकारियों ने उन पर निर्धारित शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया।

फिलहाल, विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद दोनों नेता तिहाड़ जेल से रिहा हो चुके हैं। हालांकि, रिहाई का मतलब यह नहीं है कि मामले से जुड़ी सभी कानूनी शर्तें समाप्त हो गई हैं। अदालत ने स्पष्ट रूप से उन्हें निर्धारित तारीखों पर पेश होने और अपने बांड की शर्तों का पालन करने का निर्देश दिया है।

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