अमेरिका में काम करने का सपना देख रहे भारतीय पेशेवरों के लिए एच-1बी वीजा नियमों में सख्ती चिंता का विषय बनी हुई है। इस बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नई आव्रजन नीतियां भारत को निशाना बनाकर नहीं बनाई गई हैं। उनका कहना है कि अमेरिका अपने आव्रजन सिस्टम में बदलाव कर रहा है, ताकि अमेरिकी नागरिकों, कर्मचारियों और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जा सके।

22 अक्टूबर 2026 को India Today TV को दिए एक विशेष इंटरव्यू में रुबियो ने स्वीकार किया कि अमेरिकी वीजा नियमों में बदलाव का असर भारतीय पेशेवरों और उन अमेरिकी कंपनियों पर पड़ रहा है, जो भारत से कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करना चाहती हैं। हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि ये नियम किसी एक देश के खिलाफ नहीं, बल्कि दुनियाभर के आवेदकों पर लागू होने वाली व्यापक नीति का हिस्सा हैं।
रुबियो के साथ भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर भी इंटरव्यू में मौजूद थे। दोनों ने आव्रजन नीति, अमेरिकी श्रमिकों के हितों और भारत-अमेरिका संबंधों पर अपनी बात रखी।
‘वीजा नियम भारत के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए हैं’
मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका की आव्रजन नीति में किए जा रहे बदलावों का उद्देश्य भारत को निशाना बनाना नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि इन बदलावों से अमेरिका में नौकरी पाने की कोशिश कर रहे भारतीयों और उन्हें नियुक्त करने वाले अमेरिकी कारोबारियों पर असर पड़ रहा है।
रुबियो के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन की कोशिश आव्रजन व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही समस्याओं को दूर करने की है। उन्होंने कहा कि कुछ कारोबारी आव्रजन कार्यक्रमों में धोखाधड़ी और नियमों के दुरुपयोग की शिकायतें रही हैं। प्रशासन का दावा है कि इन खामियों के कारण अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार के अवसर भी प्रभावित हुए हैं।
उन्होंने कहा कि अमेरिका ऐसी व्यवस्था बनाना चाहता है, जो उसकी अर्थव्यवस्था और नागरिकों के हितों के अनुरूप हो। रुबियो ने स्पष्ट किया कि इन बदलावों का दायरा वैश्विक है और इन्हें किसी एक देश के खिलाफ उठाए गए कदम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
ट्रंप सरकार में अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता
इंटरव्यू के दौरान रुबियो ने कहा कि हर देश अपनी जनता और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। उन्होंने भारत का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि भारत सरकार हमेशा भारतीय नागरिकों के हितों को सबसे ऊपर रखेगी।
इसी तरह, उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी सरकार भी अपने नागरिकों, कर्मचारियों और देश के हितों को प्राथमिकता देगी।
रुबियो का बयान ट्रंप प्रशासन की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के अनुरूप है। इस नीति के तहत अमेरिकी सरकार घरेलू रोजगार, आर्थिक हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में रखती है। प्रशासन का तर्क है कि विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाले कार्यक्रमों में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उनका इस्तेमाल अमेरिकी श्रमिकों के अवसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए न हो।
हालांकि, इस नीति का असर उन कंपनियों पर भी पड़ सकता है, जो तकनीक, इंजीनियरिंग और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में विदेशी पेशेवरों पर निर्भर हैं।
अमेरिकी कंपनियों के लिए भी चुनौती
एच-1बी वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। इसका इस्तेमाल विशेष रूप से तकनीक, सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में किया जाता है।
भारतीय नागरिक एच-1बी वीजा पाने वालों में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। यही वजह है कि नियमों में बदलाव का असर भारतीय आईटी पेशेवरों, इंजीनियरों और अमेरिका में काम करने की योजना बना रहे युवाओं पर पड़ सकता है।
भारतीय कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली अमेरिकी कंपनियों के लिए भी सख्त नियम चुनौती बन सकते हैं। कंपनियों को वीजा प्रक्रिया, पात्रता, वेतन और नियुक्ति से जुड़े नियमों का अधिक सावधानी से पालन करना पड़ सकता है। इससे भर्ती की लागत और प्रक्रिया में लगने वाला समय बढ़ने की आशंका है।
रुबियो ने स्वीकार किया कि नई नीतियों का असर अमेरिकी कारोबारियों पर भी पड़ रहा है। हालांकि, उनका कहना है कि प्रशासन के लिए आव्रजन प्रणाली में कथित धोखाधड़ी और दुरुपयोग की समस्याओं को दूर करना जरूरी है।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी किया समर्थन
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी रुबियो के बयान का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि आव्रजन नियमों में बदलाव केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका संबंध व्यापक अमेरिकी नीति से है।
गोर ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का बचाव करते हुए कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका बाकी दुनिया से अलग रहना चाहता है। उनके मुताबिक, अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए दूसरे देशों के साथ संबंध और सहयोग बनाए रख सकता है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका को अपनी आव्रजन व्यवस्था की समीक्षा करने की जरूरत थी। गोर ने पिछले वर्षों में सीमा नियंत्रण और आव्रजन नियमों के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए तथा कहा कि मौजूदा प्रशासन इन समस्याओं को ठीक करने की कोशिश कर रहा है।
गोर ने यह भी कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने का पूरा अधिकार है और इसी तरह अमेरिका भी अपनी नीतियां तय कर सकता है।
एच-1बी वीजा नियमों में क्या बदलाव हुए हैं?
अमेरिका में एच-1बी वीजा से संबंधित नियमों में हाल के महीनों में कई सख्तियां सामने आई हैं। इनका असर नए आवेदकों के साथ-साथ पहले से अमेरिका में काम कर रहे कुछ विदेशी पेशेवरों पर भी पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, वीजा नवीनीकरण के दौरान पहले से मंजूर आवेदनों को मिलने वाली कुछ प्रक्रियागत राहतों में बदलाव किया गया है। इसके चलते पुराने अनुमोदनों के आधार पर विस्तार पाने वाले आवेदनों की भी अधिक विस्तृत समीक्षा हो सकती है। इससे कुछ आवेदकों को देरी या अस्वीकृति का जोखिम बढ़ने की आशंका है।
इसके अलावा, विदेश से नए एच-1बी कर्मचारियों को लाने से संबंधित कुछ याचिकाओं पर 1 लाख डॉलर की फीस की शर्त लागू होने की खबरें हैं। यह प्रावधान सभी एच-1बी आवेदनों पर समान रूप से लागू होने वाला सामान्य शुल्क नहीं है; इसका दायरा संबंधित आदेश और याचिका की श्रेणी पर निर्भर करता है।
वेतन के आधार पर चयन को अधिक महत्व देने वाली व्यवस्था पर भी चर्चा हुई है। यदि अधिक वेतन वाली नौकरियों को चयन प्रक्रिया में प्राथमिकता मिलती है, तो शुरुआती करियर वाले पेशेवरों और कम वेतन वाली भूमिकाओं के आवेदकों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन हो सकती है।
भारतीय पेशेवरों के लिए क्या मायने हैं?
मार्को रुबियो के बयान से यह स्पष्ट है कि अमेरिकी प्रशासन अपनी आव्रजन नीति को घरेलू रोजगार और राष्ट्रीय हितों के नजरिए से देख रहा है। भारत को निशाना बनाने से इनकार करने के बावजूद उन्होंने यह स्वीकार किया कि बदलावों का असर भारतीय कर्मचारियों और अमेरिकी कंपनियों पर पड़ रहा है।
भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा आवेदन से पहले पात्रता, नियोक्ता की जिम्मेदारियों, लागू शुल्क और नवीनतम नियमों की जांच करना महत्वपूर्ण होगा। खासकर नए आवेदकों और वीजा नवीनीकरण कराने वालों को यह समझना चाहिए कि अलग-अलग श्रेणियों पर नियम अलग हो सकते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच तकनीक, व्यापार और निवेश के क्षेत्र में मजबूत संबंध हैं। ऐसे में दोनों देशों के सामने एक ओर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और दूसरी ओर कुशल पेशेवरों की आवाजाही तथा कारोबारी सहयोग को बनाए रखने की चुनौती है।
रुबियो और गोर के बयानों से संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन अपनी नीतियों में बदलाव जारी रखने के पक्ष में है। हालांकि, भारतीय पेशेवरों पर इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि नए नियम किस श्रेणी के आवेदकों पर लागू होते हैं और उन्हें व्यवहार में किस तरह लागू किया जाता है।
